इसमाद

Tuesday, October 4, 2011

उत्‍तर बिहार में शास्‍त्रीय संगीत की सूखती रसधार



आशीष झा
अगर हम उत्‍तर बिहार में शास्‍त्रीय संगीत के इतिहास पर गौर करें तो यह साबित होता है कि इस इलाके ने बिहार के सामाजिक और संस्‍कृतिक जीवन में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा की है। लोक नृत्‍य संगीत ही नहीं, अभिजात्‍य संगीत की परंपरा भी भूलाई नहीं जा सकती। यहां के लोग संगीत को जीवन का अभिन्‍न अंग मानकर उसे विकसित करते रहे हैं। यही कारण है कि मिथिला के लोक गीतों में भी शास्‍त्रीयता की गहरी छाप देखी जा सकती है। कभी ख्‍याल और ध्रुपद की उत्‍तर बिहार खासकर मिथिला में तूती बोलती थी, आज वह रसधार सूख चुकी है। आम लोगों की बात तो दूर उन घरानों में भी संन्‍नाटा पसरा है। कहीं संगीत के प्रति वह पागलपन देखने को नहीं मिलता। कहने के लिए अब भी इन घरानों की नई पीढी रोज रियाज कर रही है, लेकिन फिर भी उत्‍तर बिहार में शास्‍त्रीय संगीत के प्रति लोगों में वो जिज्ञासा नहीं देखी जा रही है, जो दिखनी चाहिए। आज ध्रुपद की अपेक्षा ख्‍याल गायकी के प्रति युवाओं में इच्‍छा देखी जा रही है। संरक्षकों का अभाव या फिर संगीत से टूटते रिश्‍ते, कारण जो भी हो, लेकिन गायकों के रियाज मे भी वह अनुशासन नहीं दिखता, जो इनके पूर्वजो में पाया जाता था। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि 250 साल से अधिक पुरानी उत्‍तर बिहार की शास्‍त्रीय गायकी की धारा अगर सूखी नहीं है, तो उसमें वो बहाव भी नहीं रहा।

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कर्नाट वंश की देन है शास्‍त्रीय संगीत
मिथिला मे संगीत का इतिहास 11वी सदी से मिलता है। उस वक्‍त इस क्षेत्र पर सिंहराव के कर्णाट वंश का शासन था। उस समय इस वंश केशासक न्‍यायदेव (1097-1134) ने संगीत को स्‍थापित करने मे अहम भूमिका निभाई। मिथिलेश न्‍यायदेव उच्‍च कोटि के कला जोहरी तो थे ही खुद भी महान संगीतज्ञ थे। उन्‍होंने रागों का सम्‍यक विश्‍लेषण और वर्गीकरण कर राग संगीत को नई दिशा प्रदान की। उनके द्वारा लिखि गई पुस्‍तक सरस्‍वती ह़यदालंकार की पांडुलिपि आज भी पुणे मे सुरक्षित है। वैसे यह पुस्‍तक भारत भाष्‍य के नाम से भी प्रसिद्ध है। उनके समकालीन मिथिला के भोज, सामश्‍वर, परमर्दी, शारंगदेव आदि भारतीय संगीत के महान शास्‍त्रकार हुए। खडोरे वंश के मिथिला नरेश शुभंकर (1516-1607) को कुछ विद्वान बंगाल निवासी मानते हैं, लेकिन अधिकांश लोगों का मानना है कि वे मिथिलावासी थे। ल्‍वेयन भी अपने रागतिरंगनी मे इनका एक मैथिल के रूप मे ही जिक्र करते हैं। शुभंकर ने संपूर्ण संगीत को एक नई उंचाई प्रदान की श्रीहस्‍तमुक्‍तावली के साथ साथ उन्‍होंने संगीत दामोदर की रचना की। संगीत दामोदर मे ही पहला मैथिल राग शुभग का उल्‍लेख मिलता है। इस ग्रंथ मे पहली बार 101 तालों की चर्चा की गई है। शुभंकर ने इस ग्रंथ मे यह भी साबित करने की कोशिश की है कि बीना के 29 प्रकार हैं। मार्गी संगीत को मिथिला में मान्‍यता ही नहीं भरपूर आनंद भी मिलता है। कर्नाट वंश के अंतिम राजा मिथिलेश हरि सिंह देव के दरबारी मैथिल विद्वान और कुशल संगीतज्ञ ज्‍योतिश्‍वर ठाकुर 14वी सदी के कलावंत का उल्‍लेख विद्वावंत के रूप मे किया है। ज्‍योतिश्‍वर ने पहली बार 18 जाति, 22 श्रुति और 21 मुर्च्‍छना की खोज की। चूंकि न्‍यायदेव कर्नाट से आए थे जाहिर है कि वे अपने साथ कर्नाटीय पद्धति भी लाए होंगे। इस संबंध मे कला विद्वान गजेंद्र सिंह कहते हैं कि बहुत संभव है कि मिथिला का प्रथम विख्‍यात राग तिरहुत मूलत: कर्नाट पद्धति की ही देन हो। मिथिला के विख्‍यात संगीतका, शास्‍त्रकार और राग तिरंगीनी के प्रणेता लोचन कवि (1650-1725) ने मिथिला मे रागों की उत्‍पत्ति नाद-तिरुपण और तिरहुत देस मे प्रचलित राग गीत, छंद, ताल आदि की सविस्‍तार चर्चा की है। ऐसे कई रागों का जन्‍म उन्‍होंने इस ग्रंथ के माध्‍यम से दिया जिसकी मिथिला को संगीत की बंलंदियों पर ला खडा किया। इस ग्रंथ मे कई ऐसे राग मौजूद हैं। लोचन ने आडाना जैसे रागों को रच कर मिथिला की शास्‍त्रीय संगीत परंपरा को एक ठोस आधार प्रदान किया। समस्‍त भारत इस बात पर एक मत है कि मध्‍य काल मे रागतरंगिनी उत्‍तर भारतीय संगीत का मानक ग्रंथ है। मध्‍य काल मे मैथिल संगीतज्ञों की पूरे भारत मे धूम रही। इस कालखंड मे मिथिला के संगीतज्ञों ने बंगाल व उत्‍तरप्रदेश मे काफी ख्‍याति अर्जित की। पीसी बागची की रचना भारत और चीन के अनुसार 7वीं से 10वीं सदी में इनकी धूम चीन मे भी काफी थी। मिथिला के बुधन मिश्र 12वीं सदी के महान कवि जयदेव के समकालीन थे। उत्‍तर प्रदेश से त्रिपुरा तक अपने संगीत का जोहर दिखानेवाले इस संगीतज्ञ ने एक बार जयदेव को भी ललकारा था। अपने समय के इस सबसे बडे संगीत प्रतियोगिता मे बुधन मिश्र ने विजय प्राप्‍त कर मिथिला का परचम पूरे देश मे लहराया था। कर्नाट वंश के मिथिला नरेशों मे न्‍यायदेव से लेकर हरिसिंह देव (1303-26) तक छह पुश्‍तों मे संगीत की परंपरा प्रबल रही। मुस्लिम आक्रमण के कारण 1326 मे हरिसिंह देव नेपाल जाकर बस गए। वहां हरिसिंह ने नेपाली संगीत को संवारा और संपन्‍न किया।

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यहां निर्मित कुछ राग
उत्‍तर बिहार की जमीन पर कई राग रचे गए। यहां रचे अधिकतर राग या तो राग निर्माताओं के साथ ही खत्‍म हो गए या फिर कुछ एक घराने में पीढियों के पास सुरक्षित है। बेतिया के संगीतप्रेमी नरेश आनंद किशोर द्वारा निर्मित ध्रुपद संगीत के ग्रंथ आनंद सागर में कई ऐसे रागों का जिक्र मिलता है जिसका जिक्र और कहीं उपलब्‍ध नहीं है। इन रागों में राग सुरह, राग शंख, राग सिंदुरा मल्‍हार आदि महत्‍वपूर्ण कहे जाते हैं। लोचन ने भी कई ऐसे रागों का निर्माण या रचना की जो केवल तिरहुत में ही गाये जाते हैं। लोचन द्वारा रचित रागों में गोपी बल्‍लब, बिकासी, धनछी, तिरोथ, तिरहुत आदि प्रमुख कहे जाते हैं। दरभंगा के महाराजा रामेश्‍वर सिंह के नाम पर रामेश्‍वर राग का भी यहां निर्माण हुआ था। इस प्रकार का जिक्र भी पुस्‍तकों में मिलता है। मिथिला में रचित अन्‍य रागों में राग मंगल, राग देस, राग स्‍वेत मल्‍हार, रत्‍नाकर व भक्‍त विनोद आदि प्रमुख हैं।

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ध्रुपद मैथिली संगीत का एक ध्रुव
शारंदेव ने 13वीं सदी में प्रबंध के लगभग 300 प्रकारों का वर्णन किया। उनमें से एक प्रबंध सालगसूड के अवयबों मे ध्रुव का जिक्र मिलता है। माना जाता है कि ध्रुव से ही ध्रुपद का प्रदुभाव हुआ। स्‍थाई अंतरा संचारी और अभोग में शब्‍द स्‍वर तथा लय का जैसा सुंदर संमवित स्‍परूप ध्रुपद मे देखने को मिलता है वैसा अन्‍य किसी गेय विधा मे नहीं मिलता। इसी लिए ध्रुपद को हिंस्‍दुस्‍तानी संगीत का ब्राहमण कहा जाता है। प्राचीन काल में ध्रुपद एक समूह गायन था जिसको मूगल काल मे एकल प्रस्‍तुति किया जाने लगा। दरसल ध्रुपद गायकी गंभीर प्राचीन होने के साथ अध्‍यात्‍मिक भक्ति का सृजन करता है। जिसको साधक शांत भाव से और धीर गंभीर गमक आदि द्वारा ध्रुपद गायन को व्‍यक्‍त करता है। उत्‍तर बिहार मे ध्रुपद की दो परंपराएं विकसित हुई जो बेतिया और दरभंगा राज्‍य के संरक्षण मे फलती-फूलती रही। इन दोनों घरानों मे बेतिया घराना प्राचीन है। इस घराने का उदभव 17वीं सदी के आसपास माना जाता है। इन दोनों राजवारे के शासन ने केवल इन दोनों घरानों को संरक्षण नहीं दिया बल्कि इन राजवारों के राजा स्‍वयं उच्‍च कोटी के संगीतज्ञ भी थे। उत्‍तर बिहार मे ध्रुपद गायन और धराने को स्‍थापित करने का श्रेय बेतिया के राजा गज सिंह को जाता है।
दरभंगा के मल्लिक घराना लगभग 250 साल पुराना है। प्रख्‍यात लोक गायिका जयंती देवी के अनुसार राधाकृष्‍ण और कर्ताराम नामक दो भाई मिथिला नरेश माधव सिंह( 1775-1807) के शासन काल में पश्चिम भारत शायद राजस्‍थान से दरभंगा आए। प्रख्‍यात ख्‍याल गायक रामजी मिश्र का कहना है कि नींव किसी ने भी रखी हो लेकिन दरभंगा घराने के प्रथम नायक छितिपाल मल्लिक थे। 1936 मे मुजफ़फरपुर के संगीत मर्मज्ञ बाबू उमाशंकर प्रसाद द्वारा आयोजित अखिल भारतीय संगीत सम्‍मेलन मे दरभंगा घराने के महावीर व रामचतुर मल्लिक बंधु द्वारा ऐसा युगल गायन प्रस्‍तुति किया गया कि वहां आए सभी गुणीजनों ने एक मत से उन्‍हें संगीताचार्य की उपाधि से विभूषित किया। बाद में भारत सरकार ने रामचतुर मल्लिक और सियानाम तिवारी को पद़मश्री से नवाजा।
आज ध्रुपद मिथिला के लिए अंजान बन चुका है। इसके संबंध में बतानेवाले भी कम हो चुके है। दरभंगा स्थित ध्रुपद विद्यालय भी कहने मात्र को है। संगीत का कोई बडा आयोजन पिछले 22 साल से नहीं हुआ है। अच्‍छे कलाकार क्षेत्र छोड चुके हैं।
आज ध्रुपद की अपेक्षा ख्‍याल गायकी के प्रति युवाओं में इच्‍छा देखी जा रही है। इसका कारण ख्‍याल की लोकप्रियता और आर्थिक पक्ष माना जा रहा है। उत्‍तर बिहार में इस रुझान को बढावा देने का काम रामजी मिश्र ने किया। कभी ध्रुपद गाने वाला मधुबनी घराने के वारिस रामजी मिश्र की ख्‍याति आज ध्रुपद से ज्‍यादा ख्‍याल गायन से है। इन्‍होंने अपने पिता आद्या मिश्र से ध्रुपद की शिक्षा ली, लेकिन बाद में इनका रुझान ख्‍याल की तरफ हुआ और फिर ख्‍याल की विधिवत शिक्षा ग्रहण कर 1956-58 में इन्‍होंने राष्‍टपति से स्‍वर्ण पदक प्रप्‍त किया। मिश्र के पास जहां घराने से मिली ध्रुपद गाने की क्षमा दिखी, वहीं ख्‍याल गायकी के प्रति व्‍यक्तिगत रुझान के कारण ख्‍याल गायकों में अपनी एक अलग पहचान देश भर में बना लिया। रामजी मिश्र ने दरभंगा स्थित मिथिला विश्‍वविद्यालय में संगीत विभाग खुलवाने में अहम भूमिका निभाई।


बेतिया घराना
बेतिया घराना उत्‍तर बिहार का पहला संगीत घराना है। इस घराने का उदभव 17वीं सदी के आसपास माना जाता है। उत्‍तर बिहार मे ध्रुपद गायन और इस घराने को स्‍थापित करने का श्रेय बेतिया के राजा गजसिंह को जाता है। दिल्‍ली दरबार के अंत के साथ ही वहां के गवैये को छोटे राजाओं की जरूरत महसूस होने लगी। इस क्रम मे राजा गजसिंह ने कुरूक्षेत्र के पास के एक गांव के गवैयों चमारी मल्लिक (गायक) और कंगाली मल्लिक (बीनकार) को अपने साथ बेतिया लाकर दरबार का प्रमुख संगीतज्ञ नियुक्‍त कर दिया। यही से इस घराने का शुभारंभ माना जाता है। बेतिया घराने के ध्रुपदिय गायक अपने गायन मे संक्षिप्‍त अलाप और बेलबाट वर्जित रखते हैं। ये संपूर्ण गायन के लय मे कोई बदलाव नहीं करते। इस घराने के गायकों के गायन मे ख्‍याल की तरह विस्‍तार भी वर्जित है। दंदिशया रचनाओं मे फेरबदल किये बिना रागानुकुल गायन इनकी सबसे प्रमुख विशेषता है। अंतिम सोनिया उस्‍ताद अली खां से प्राप्‍त ध्रुपद की बंदिशें केवल बेतिया घराने मे ही उपलब्‍ध था। बेतिया घराने के दिग्‍गज ध्रुपदियों की वंश परंपरा को महंत मिश्र ने अपने कंधो पर उठाया रखा। आज इस घराने का दारोमदार पंडित इंद्रकिशोर मिश्र के कंधे पर है। उनकी बेटी इस घराने की उम्मीद है।
आज यह घराना अपने स्‍वर्ण काल मे नहीं है लेकिन यह सुखद आश्‍चर्य है कि 200 साल पहले बेतिया नरेश द्वारा लगाई गई इस संगीत बगिया के ये फूल मुडझाते हुए भी अपनी खूशबू बिखेरने में अभी भी संक्षम हैं। फिर भी इतना तो मानना ही पडेगा कि फूल मुडझा चुके हैं।
इस घराने के अनमोल रत्‍न : गोपाल मल्लिक, कांके मल्लिक, फजल हुसैन, काले खां, श्‍यामा मल्लिक, उमाचरण मल्लिक, गोरख मल्लिक, राजकिशोर मल्लिक, महंत मल्लिक, शंकरलाल मल्लिक आदि प्रमुख है।

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दरभंगा घराना
दरभंगा के मल्लिक ध्रुपदियों की परंपरा कोई 200 साल की है। राधाकष्‍ण और कर्ताराम नामक दो भाई मिथिला नरेश माधव सिंह (1775-1807) के शासन काल मे पश्चिम भारत शायद राजस्‍थान से दरभंगा आए। ये लोग दरभंगा के मिश्रटोला मे बस गए। बाद मे महाराज ने इन लोगों को अमता गांव के पास गंगदह मे जमीन देकर बसा दिया। कहा जाता है कि इन्‍होंने ही दरभंगा घराने की नींव रखी। दरभंगा के मल्लिक ध्रुपदीय गौडबानी ध्रुपद गाते हैं। गौडबानी ध्रुपद मे स्‍वर विस्‍तार की जो संयोजन करते हैं, वो रंजकता से परिपूर्ण है और उदभुत होती है। यही इनकी पंडित्‍यपूर्ण गायकी की और संबल परंपरा को दिखाती है। दरभंगा घराने के गायन की विशेषता यहां के गायकों के नोम-तोम की अलापचारी मे है। दरभंगा घराने की छाप मिथिला समाज पर यहां तक देखी जाती है कि मिथिला के अधिकतर परंपरागत लोक गीतों की बंदिश ख्‍याल मे न होकर ध्रुपद मे ही की हुई है। यह महज दुर्भाग्‍य है कि मैथिल कोकिल विद्यापति की रचनाओं को उस हद तक ध्रुपद मे अब तक नहीं गाया जा सका है। दरभंगा घराने के दो गायकों को भारत सरकार ने पद़मश्री से नवाजा है। सबसे पहले इस सम्‍मान पंडित रामचतुर मल्लिक को दिया गया और बाद में सियाराम तिवारी को इस सम्‍मान से नवाजा गया। दरभंगा मे घ्रुपद का आखरी बडा आयोजन हुए 20 साल बीत चुके हैं। इस घराने के अधिकतर प्रतिनिधि मिथिला को छोड अन्‍य प्रदेशों मे रह रहे हैं। वैसे राम कुमार मल्लिक दरभंगा में हैं और उनके तीन पुत्र और पुत्री इस परंपरा को आगे ले जाने में लगे हुए हैं। लेकिन इस मामले में दरभंगा को सबसे बडा झटका तब लगा जब विदुर मल्लिक यहां से विदा हुए। विदुर मल्लिक रामचुतुर मल्लिक के बाद सबसे कुशल गायक थे। मिथिला की लोक गायिका जयंती देवी का कहना है कि विदुर का जाना एक प्रकार से यहां से ध्रुपद का जाना कहा जा सकता है। वे कहती हैं कि विदुर को अभय के समान रामचतुर जी ने प्रमोट नहीं किया, फिर भी विदुर ने जो स्‍थान ध्रुपद के क्षेत्र में बनाया वो दरभंगा घराने की माटी में बसे संगीत को ही साबित करता है। विदुर जरूर मिथिला को छोड वृदांवन में जा बसे, लेकिन वे कभी दरभंगा से जुदा नहीं हो सके। इसी प्रकार अभय नारायण मल्लिक खैडागढ, जबकि विदुर मल्लिक के पुत्र प्रेमकुमार मल्लिक इलाहाबाद मे जा बसे। जो कुछ भी हो आज दरभंगा खुद इस घराने के प्रति अंजान हो चुका है। लेकिन उम्मीद कभी कायम है। इस घराने ने प्रियंका के रूप में जहां पहली महिला गायिका पा लिया है, वहीं मल्लिक परिवार की 13वीं पीढ़ी के आठ गायकों ने इस उम्मीद को पुख्ता किया है कि इतिहास दोहरा सकता है।

इस घराने के अनमोल रत्‍न : कर्ताराम मल्लिक, कन्‍हैया मल्लिक, निहाल मल्लिक, रंजीतराम मल्लिक, गुरुसेवक मल्लिक, कनक मल्लिक, फकीरचंद मल्लिक, भीम मल्लिक, पद़मश्री सियाराम तिवारी आदि।

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मिथिला के ख्‍यालों में जा बसा ख्‍याल
ख्‍याल का अर्थ ही है कल्‍पना या अपनी कल्‍पना से स2जन करना। अर्थात ख्‍याल गायक अपनी साधना में गंभीरता के साथ साथ चंचल प्रक2ति को भी दिखाता है। इसे दिखलाने के लिए गायक अपने गले मे अधिक तैयारी मुरछना, तान तथा लयों के विभिन्‍न प्रकारों को आ‍कर्षक ढंग से श्रोताओं के समक्ष प्रस्‍तुति करता है। अभिजात्‍य संगीत के अंतर्गत न केव ध्रुपद बल्कि ख्‍याल विशेष कर ठुमरी की सम2द्ध परंपरा मिथिला मे रही है। यद्यपि ध्रुपद के समान मिथिला मे ख्‍याल का कोई बडा घराना नहीं हुआ। लेकिन कुछ एक छोटे घराने व कुछ महान कलाकारों ने इसे मिथिला मे स्‍थापित ही नहीं बल्कि अपने गायन से दुनिया को सम्‍मोहित किया। ख्‍याल गायकों मे सबसे उल्‍लेखनीय स्‍थान पूर्व मिथिला के बनैली राज्‍य के कुमार श्‍यामानंद सिंह का है। इनको ख्‍याल से विभिन्‍न घराने के पुराने गुणिजनों से मार्गदर्शन प्राइज़ था। कुमार साहब पेशेवर गायक नहीं थे, लेकिन उनकी ख्‍याति का प्रमाण इसी से लगाया जा सकता है कि उस्‍ताद बिलायत हुसैन उन्‍हें उत्‍तर भारत का सर्वर ख्‍याल गायक मानते थे। गजेंद्र नारायण सिंह की पुस्‍तक में मिथिला के एक और महान ख्‍याल गायक का जिक्र मिलता है। पंचगछिया (सहरसा) के रायबहादुर लक्ष्‍मीनारायण सिंह का टहलू खबास (नौकर) मांगन अपने समय का महान ख्‍याल गायक था। उसकी ख्‍याति दूर देश तक फैली हुई थी। उसने ओंकारनाथ ठाकुर को भी अपने गायन से प्रभावित किया था। रसभरी ठुमरी गायन मे उसका कोई जोर नहीं था। कहा जाता है कि वह जब मेघ जैसा वर्षाकालीन राग गाता था तो आसमान मे बादल छा जाते थे। 1936 के आसपास मंगन ने बंगाल और पूर्वी प्रदेशों मे अपने गायन की गहरी छाप छोडी। इसी दौरान मंगन पंचगछिया से दरभंगा आ गए। वह जल्‍दी ही दरभंगा के संगीत प्रेमी राजबहादुर विशेश्‍वर सिंह का खास गायक बन गए। संगीत जगत के लिए इसे अभिशाप ही कहेंगे कि इस अदभुत गायक का ना तो रिकार्ड ही बन पाया और न ही कोई तसवीर ही खींची जा सकी। मंगन जैसा उदाहरण शायद ही विश्‍व में कहीं और मिले जो एक चाकर से महान गायक बन गया।
ख्‍याल गायकों पनिचोभ मधुबनी) के गायकों का भी महत्‍वपूर्ण स्‍थान माना जाता है। इस धराने के सबसे विलक्ष्‍ण गायक अबोध झा 1840-1890) के पुत्र रामचंद्र झा(1885) थे। वैसे ये बनैली राज घराने में गाया करते थे, लेकिन इनका गायन दरभंगा राज दरबार में भी होता रहता था। ख्‍याल गायकी का बगिया आज बागवान का इंतजार कर रहा है।

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स्‍मरण
ए रामचतुरबा तू का गैवे

दरभंगा राज का दरबार हॉल श्रोताओं से भरा हुआ था। महाराज और उनके छोटे भाई कजनी बाई की ठुमरी का आनंद ले रहे थे। कजनी बाई की ठुमरी खत्‍म होते ही राजाबहादुर ने रामचतुर मल्लिक को गाने का आदेश दिया। ध्रुपद के इस गायक को ठुमरी गाने का आदेश सुन कजनी बाई से रहा न गया। उसने मुस्‍कुराकर कहा- ए रामचतुरबा तू का गैवे। रामचतुर मल्लिक बिना कुछ बोले ठुमरी की बंदिश गाने लगे। कुछ ही पल बाद कजनी बाई ने एक और बंदिश सुनने की ख्‍वाइश जाहिर की। ध्रुपद के इस महान गायक का मानना था कि जो ध्रुपद गा सकता है वो सब कुछ गा सकता है। दरभंगा घराने के इस रत्‍न का जन्‍म 1902 से 1907 के बीच बताया जाता है। लेकिन अधिकतर लोगों का मत है कि उनका जन्‍म 1907 मे दरभंगा के अमता गांव में हुआ था। पंडित जी के पडोसी होने के नाते मुझे उन्‍हें देखने और सुनने का मौका मिला। लेकिन बचपन की मस्‍ती ने कभी बैठकर या रूक कर उन्‍हें सुनने न दिया। जब भी कभी हमारे मित्र मुझे हकलाने पर चिढाते थे, पंडित बाबा मुझे कहा करते थे कि गा कर बात कर, नहीं गहलाएगा। पंडित जी का लोहा डागर बंधु भी मानते थे। उन्‍हें केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी अवार्ड और भारत सरकार द्वारा पद़मश्री से नवाजा गया, वहीं खैरागढ विश्‍वविद्यालय ने डॉक्‍टर की उपाधि देकर उन्‍हें सम्‍मानित किया। रामचतुर मल्लिक मिथिला की संगीत परंपरा को सुदूर यूरोपीय देशों तक ले गए। उनके पास प्रचीन बंदिशों का खजाना था। उस्‍ताद फैयाज खां के बाद वही एक मात्र गायक हुए जो चारों पट कुशलतापूर्व गा सकते थे। बिहार सरकार की बेरुखी और लंबी बीमारी ने इस महान गायक को हमेशा के लिए खामोश कर दिया। जनवरी 1990 में उनके निधन से मिथिला की रसधार सूख गई। रामचतुर मल्लिक के बाद मिथिला मे ध्रुपद का एक प्रकार स अंत ही हो गया। आज मिथिला में ध्रुपद को बचाना ही उनके प्रति सच्‍ची श्रद्धांजलि होगी।


व्‍यवसायिकता से दूर एक कला साधक
कुमार श्‍यामानंद सिंह की भतीजी की शादी में खास तौर पर पंडित जसराज को गाने के लिए बनैली बुलाया गया। सुबह जसराज ने मंदिर में किसी को भजन गाते सुना। वहां जाने पर गानेवाला और कोई नहीं कुमार साहब खुद थे। भजन सुनते-सुनते जसराज रोने लगे। पूछने पर उन्‍होंने कहा कि जो भजन ऐसा गा सकता है वो ख्‍याल कैसा गाएगा। रात की महफिल में जसराज कुमार साहब से कई ख्‍याल की बंदिश सुनी। कुमार श्‍यामानंद सिंह का जन्‍म पूर्व मिथिला के बनैली राज घराने में हुआ। कुमार साहब पेशेवर गायक नहीं थे। यही कारण है कि आधुनिक गायक उनके विषय में कम ही जानते हैं। लेकिन कुमार साहब की संगीत में गहरी पैठ थी। वे कई बडे गबैये को अपना कायल बना चुके थे। प्रख्‍यात केसर बाई केरकर के साथ घटी घटना का जिक्र गजेंद्र नारायण सिंह अपनी पुस्‍तक में किया है। 1946 की एक महफिल में केसर बाई कुमार साहब की बंदिश सुनकर उनसे गंडा बांधने के लिए तैयार थी। इस बंदिश का स्‍थाई तो केसर बाई ने अपने गले में उतार लिया, लेकिन अंतरा नहीं उठा सकी। इसका उन्‍हें मरते दम तक गम रहा। इस प्रकार की एक और घटना का जिक्र उक्‍त किताब में किया गया है। कहरवे अवध एक बंदिश में कुमार साहब के साथ संगत कर रहे मशहूर तबला वादक लतीफा के हाथ तबले पर ही धरे रह गए। कुमार साहब के एक रिश्‍तेदार का कहना है कि कुमार साहब का मानना था कि ताने अलंकार हैं। अलंकार धारण करने के लिए आधार यानि शरीर चाहिए। और बंदिश वही शरीर है।
1986 में दरभंगा में आयोजित ध्रुपद समारोह में कुमार साहब ने भी भाग लिया था। तभी मुझे भी उनसे मिलने का मौका मिला। संयोग से वे हमारे नाना के घर पर ही रुके थे। कुमार साहब जब रियाज करते थे, तो संगीत नहीं जाननेवाला भी रुक कर उन्‍हें सुनने लगता था। ख्‍याल गायकी की जो कल्‍पना क्षमता उनमें थी शायद ही ऐसी क्षमता मिथिला में फिर देखने को मिले। कुमार साहब आज हमारे बीच नहीं हैं। उनका निधन 1995 में हो गया।

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परंपरा बचाने में लगे कुछ कला साधक

संगीत कुमार नाहर : बेतिया घराने में 1956 में जन्‍में संगीत कुमार नाहर बचपन से ही गायन की बानगी प्रस्‍तुत करने लगे। अपने दादा बद्रीनाथ मिश्र और पिता प्रह़लाद मिश्र से उन्‍होंने संगीत की शिक्षा प्राप्‍त की। आकाशवाणी में काम करते हुए बेतिया की संगीत परंपरा को बचाने में इन्‍होंने काफी योगदान दिया है। मिश्र एक कुशल संगीत रचनाकार के रूप में भी समस्‍त भारत में जाने जाते हैं। बेतिया घराने में आर्थिक बदहाली के बाद भी संगीत नाहर जैसे बंशजों कुछ ऐसी बंदिशें बचा रखी हैं जो और कहीं सुनने को नहीं मिलता है।

अभयनारायण मल्लिक : दरभंगा घराने के ध्रुपदियों की परंपरा को अभयनारायण मल्लिक आगे बढाने में लगे हुए हैं। अभयनारायण मल्लिक का जन्‍म 1938 में दरभंगा में हुआ। अभय नाराण ध्रुपद के महान गायक रामचतुर मल्लिक के शिष्‍य हैं। दरभंगा के संगीत प्रेमी राजबहादुर विश्‍वेश्‍वर सिंह का इन्‍हें आशिष प्राप्‍त था। ये अपने चाचा के समान ही ध्रुपद के साथ-साथ ठुमरी भी आसानी से गाने की क्षमता रखते हैं। केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी फलोशिप प्राप्‍त इस गायक ने मिथिला की गौरवशाली ध्रुपद परंपरा को सुदूर देश रोम और जर्मनी तक पहुंचाया। अभय नारायण का एचएमभी ने कई रिकार्ड और कैसेट भी निकाला है।

प्रेम कुमार मल्लिक : रामचुतुर मल्लिक के बाद दरभंगा घराने के सबसे कुशल ध्रुपद गायक विदुर मल्लिक के पुत्र प्रेमकुमार मल्लिक आज इस परंपरा को बचाए रखने में संघर्षरत हैं। देश में आज ध्रुपद गायकों में प्रेम कुमार का विशेष स्‍थान है। इनका जन्‍म दरभंगा में हुआ। प्रेम कुमार ने अपने गायन 1983 में यूरोपीय श्रौताओं को मोहित करने में वही सफलता हासिल की जो कभी उनके दादा रामचतुर मल्लिक ने की थी। प्रेम कुमार मल्लिक को 1980 मे राष्‍टपति से स्‍वर्ण पदक मिला और इन्‍होंने इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में अपनी गायन कुशलता को छात्रों में बांटी। आज इनके पुत्र और पुत्री प्रशांत मल्लिक और प्रियंका मल्लिक इस घराने की विशाल परंपरा को अपने कंधे पर उठाने को तैयार हैं।

बिहारी : बिहारी जी का जन्‍म 1966 में बनैली के राज परिवार में हुआ। अपने पिता कुमार श्‍यामानंद सिंह के समान ही इनको भी ख्‍याल गायकी में अच्‍छी पकड हासिल है। पिता के समान बिहारी भी पेशेवर गायक नहीं हैं। लेकिन जमींदारी चले जाने के कारण पिता के समान वे निजी तौर पर महफिलों का आयोजन नहीं कर पाते हैं। वैसे डागर बंधुओं ने उनके गायन में पिता की झलक देखने का दावा कर चुके हैं।
( मेरा यह आलेख 2001 में प्रभात खबर में छपा था, कुछ संशोधन के साथ यहां रख रहा हूं। )

1 comment:

आशुतोष said...

आपने बिहार की शास्त्रीय परंपरा की जो गौरवपूर्ण छवि रखी है,वह निस्संदेह अत्यंत महत्वपूर्ण है।यह प्रेरणा देनेवाला भी है।साधुवाद।
आशुतोष