इसमाद

Wednesday, April 20, 2016

‘पुत्र मोह’ में नीतीश कुमार के आगे झुके लालू प्रसाद !

  • विजय कुमार श्रीवास्‍तव 


देश के धाकड़ समाजवादी नेताओं में से एक राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने बिहार के सीएम और जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार को 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में समर्थन देने का एलान कर दिया है। अभी कुछ ही महीनो पहले लालू ने कहा था कि नीतीश कुमार बिहार की राजनीति करेंगे जबकि वे केंद्र के मसले देखेंगे। लेकिन लालू अब अपने पूर्व के एलान से पटलटने पर मज़बूर हो गए। राजनीतिक गलियारों में लालू के ताज़ा एलान को कई दृष्टिकोणों से देखा जा रहा है। जानकारों का कहना है कि बड़े भाई लालू ने अपने बेटों तेजस्वी और तेज प्रताप के राजनीतिक करिअर को देखते हुए छोटे भाई नीतीश के आगे घुटने टेक दिए हैं। हालांकि राजनीतिक पंडितों ने इस एलान के कई अन्य मायने लगाए हैं। इसमें नीतीश के तीर से भाजपा पर निशाना साधना और छोटे भाई की राजनीतिक नैया पर सवार होकर पटना से दिल्ली तक का सफर तय करने की मंशा के अलावा कई अन्य मंसूबे शामिल हैं।
जो भी व्यक्ति लालू प्रसाद की राजनीति को पैनी नज़र से देखता आया है उसे मालूम होगा कि लालू प्रसाद देश में कई मौक़ों पर किंग मेकर की भूमिका में रहे हैं। वे भले ही देश का पीएम नहीं बन पाए हों लेकिन इंद्र कुमार गुजराल, एचडी देवगौड़ा से लेकर चंद्रशेखर और वीपी सिंह की पीएम के रूप में ताज़पोशी में कमोवेश लालू की भूमिका ज़रूर रही थी। राजनीतिक विश्लेषकों को ये भी पता है कि कैसे लालू ने अपने ही समाजवादी कुनबे के तत्कालीन बड़े नेताओं मुलायम सिंह यादव और रामविलास पासवान के पीएम बनने की राह में रोड़ा अटका दिया था। ऐसे अवसरवादी लालू प्रसाद एक अन्य समाजवादी नेता नीतीश कुमार को अगर पीएम उम्मीदवार के रूप में तीन साल पहले ही प्रमोट कर रहे हैं तो इसके कई मायने हैं।
हाल ही में जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने के बाद बिहार के सीएम नीतीश कुमार के सितारे बुलंदी पर हैं। राष्ट्रीय राजनीति की पिच पर पहला बड़ा स्ट्रोक मारते हुए नीतीश ने देश को संघ मुक्त बनाने के अभियान का एलान कर दिया। नीतीश के इस अभियान का देश मे ग़ैर भाजपा दलों का व्यापक समर्थन मिल रहा है। लालू प्रसाद नीतीश की बढ़ती लोकप्रियता को भुनाने की कसर में लग गए हैं। वे जानते हैं कि देश में भाजपा का प्रभाव कम करना अब उनके बूते में नहीं रहा। इसलिए वे नीतीश को आगे कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि 2019 में नीतीश कुमार केंद्रीय सत्ता में आए तो बड़े भाई के रूप में उन्हें भी सत्ता में भागीदारी मिलेगी। दूसरा कारण ये भी है कि लालू को ये लगता है कि नीतीश जैस-जैसे केंद्र के नज़दीक जाएंगे वैसे वैसे बिहार की सत्ता उनके बेटों के ज्यादा नज़दीक आएगी। लालू को ये भी उम्मीद है कि अगर सबकुछ ठीक ठाक रहा तो वर्ष 2019 के पहले ही बिहार की सत्ता उनके बटे और बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को मिल सकती है। उसके बाद अगले साल यानि 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में बिहार में जीतना आसान हो जाएगा।
बिहार की राजनीति को क़रीब से जानने वाले ये भी जानते हैं कि नीतीश कुमार और लालू प्रसाद का गठबंधन दो अवसरवादियों का मज़बूरी में हुआ गठजोड़ है। नीतीश कुमार अवसर मिलने पर भाजपा के सहयोग से भी केंद्रीय सत्ता पाने में नहीं हिचकेंगे। वहीं लालू प्रसाद अपने बेटों के माध्यम से बिहार की सत्ता में काबिज़ रहने के मंसूबों पर पानी फिरता देख नीतीश की राह में रोड़े अटकाने से भी नहीं हिचकेंगे। अब समय ही ये बता पाएगा कि नीतीश और लालू के मंसूबे पूरे हो पाते हैं या नहीं।

लेखक ईटीवी बिहार में संवाददाता हैं। 

राहुल गांधी के लिए नीतीश कुमार को ना !

  • विजय कुमार श्रीवास्‍तव 

वर्ष 2019 में देश का पीएम बनने का मंसूबा पाले बैठे बिहार के सीएम और जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार के लिए राष्ट्रीय राजनीति में पांव जमाना उतना आसान नहीं है। नीतीश संघ और भाजपा मुक्त भारत के नारे के बूते गैर भाजपा दलों को एक मंच पर ‘अपने समर्थन’ में लाना चाहते हैं। लेकिन उनके मंसूबे पर राष्ट्रीय दल कांग्रेस ने पानी फेर दिया है। कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ शकील अहमद ने नीतीश के अभियान की तारीफ़ तो की लेकिन इशारों-इशारों में ये बता दिया कि राहुल गांधी पर एक और दांव खेलने का निर्णय लेने जा रही उनकी पार्टी नीतीश कुमार को पीएम के रूप में नहीं देखना चाहती है। कांग्रेस के इस रूख की वज़ह से नीतीश के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं।
राष्ट्रीय पार्टी के रूप में कांग्रेस का समय समय पर उत्थान और पतन इस देश में कोई नई बात नहीं है। इसी का एक नज़ारा वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम के रूप में भी दिखा जब केंद्र में कांग्रेस को चारों खाने चित्त करते हुए भाजपा ने उससे शासन छीन लिया। कांग्रेस के इस बार के पतन ने ही क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर उसे राजनीति करने पर मज़बूर कर दिया। बिहार में नीतीश और लालू के साथ गठबंधन करने को मज़बूर हुई कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में सिर्फ ताक़त ही नहीं मिली बल्कि वर्षों बाद सूबे की सत्ता में भागेदारी भी मिली। इससे कांग्रेस फिर से उत्साह से भर गई। उसे लगता है कि दिनोदिन गिरती भाजपा की साख का सीधा फ़ायदा उसे वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में मिल सकता है। इसलिए वो अभी से सचेत है।
उधर, बिहार में बड़ी चुनावी जीत से उत्साहित नीतीश कुमार, लालू प्रसाद और कांग्रेस के बूते राष्ट्रीय राजनीति में पांव जमाकर वर्ष 2019 में पीएम बनने का ख्वाब देख रहे हैं। लालू प्रसाद ने कई कारणों से नीतीश के पीएम उम्मीदवार बनने पर अपना समर्थन देने का एलान कर दिया। लेकिन कांग्रेस ऐसा नहीं करना चाहती है। इसके कई कारण हैं। सबसे पहला और बड़ा कारण ये है कि कांग्रेस को नीतीश कुमार की अवसरवादिता खटकती है। उसे लगता है कि नीतीश कुमार केंद्र की सत्ता तक पहुंचने के लिए आज भले ही कांग्रेस का साथ ले लें लेकिन अगर परिस्थितियां जटिल होती हैं तो वे भाजपा या कांग्रेस विरोधी अन्य दलों के साथ मिलकर भी सत्ता के शीर्ष पर जाने में संकोच नहीं करेंगे। इसलिए कांग्रेस बड़ी सावधानी के साथ कदम बढ़ा रही है। उसे बिहार में न सिर्फ सत्ता में बने रहना है बल्कि इसी बहाने इस राज्य में अपना खोया हुआ जनाधार फिर से पाना है। कांग्रेस ये भी जानती है कि दरअसल राजद और जदयू का वोट बैंक ही उसका पुराना जनाधार है। अगर राष्ट्रीय स्तर पर नीतीश कुमार के साथ समझौता किया गया तो उसे बहुत फ़ायदा नहीं मिलेगा। डॉ शकील अहमद ने ये साफ़ कर दिया है कि नीतीश कुमार की पार्टी या महागठबंधन का राष्ट्रीय स्तर पर बहुत जनाधार नहीं है।
कांग्रेस को ये भी लगता है कि भाजपा की नीतियों की वज़ह से केंद्र में उसकी सरकार 2019 के बाद वापस नहीं आएगी। ऐसे में चाहे नीतीश का साथ लें या न लें कांग्रेस फ़ायदे में ही रहेगी। हालांकि कांग्रेस में अभी इस बात को लेकर एक राय बनाई जा रही है कि राहुल गांधी को पीएम उम्मीदवार बनाया जाए या नहीं। 2019 के लोकसभा चुनाव के पूर्व कांग्रेस का नीतीश के साथ गठबंधन होगा या नहीं ये भी अभी भविष्य के गर्भ में है। इसलिए कांग्रेस अभी हो रहे या आने वाले राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी फूंक फूंक कर कदम रख रही है। वो ये संदेश नहीं देना चाहती है कि उसने अभी से नीतीश कुमार को पीएम उम्मीदवार मान लिया है। हालांकि कांग्रेस और भाजपा दोनो इस दांव में माहिर हैं कि एक दूसरे को पटखनी देने के लिए नीतीश कुमार को समर्थन दे दिया जाए। आगे राजनीति का ऊंट नीतीश, कांग्रेस और भाजपा के लिए किस करवट बैठेगा ये तो समय ही बताएगा लेकिन इतना तो तय है कि आने वाले समय में भी नीतीश कुमार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में बने रहेंगे।

- लेखक ईटीवी बिहार में संवाददाता हैं।

Wednesday, December 24, 2014

लिखने से ज्‍यादा मिटाया गया बनारस हिंदू वि‍श्व‍वि‍द्यालय का इतिहास

सुनील कुमार झा

जितने समृद्ध इतिहास के लिए भारत अपने आप में जाना जाता है उससे कहीं ज्यादा इस बात के लिए जाना जाता है कि यहाँ के इतिहास को हमेशा तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता रहा है । ऐसा ही कुछ हुआ है बनारस हिंदू वि‍श्व‍वि‍द्यालय के इतिहास के साथ भी । बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के संबंध में जो मान्य इतिहास है उसमें इस बात की कहीं चर्चा नहीं है कि इसकी स्थापना कैसे हुई और उसके लिए क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े । बनारस हिन्दू वि‍श्व‍वि‍द्यालय की गलियों से लेकर संसद के सैंट्रल हॉल तक में लगी मालवीय जी की मूर्ति बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक के रूप में दिख जाएगी लेकिन इस आंदोलन के नेतृत्वकर्ता बिहार के सपूत दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह का जिक्र तक नहीं मिलेगा जिनके बिना इस हिन्दू वि‍श्व‍वि‍द्यालय की कल्पना तक नहीं की जा सकती है । बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की इतिहास पर लिखी गई एकमात्र किताब जो स्थापना के कई वर्षों बाद 1936 में छपी थी और इसे संपादित किया था बनारस हिन्दू विश्वविद्याल के तत्कालीन कोर्ट एंड कॉउसिल (सीनेट) के सदस्य वी सुन्दरम् ने । सुन्दरम की इस किताब को पढ़कर यही कहा जा सकता है कि उन्होंने जितना बीएचयू का इतिहास लिखा है उससे कहीं ज्यादा इस किताब में उन्होंने बीएचयू के इतिहास को छुपाया या मिटाया है । यह बात साबित होती है बीएचयू से संबंधि‍त दस्तावेज से । बीएचयू के दस्तावेजों की खोज करने वाले तेजकर झा के अनुसार बीएचयू की स्थापना के लिए चलाये गये आंदोलन का नेतृत्व पंडित मालवीय ने नहीं बल्कि‍ दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह के हाथों में था । जिसका जिक्र बीएचयू के वर्तमान लिखि‍त इतिहास में कहीं नहीं मिलता है । बीएचयू के वर्तमान लिखि‍त इतिहास के संबंध में श्री झा बताते हैं कि वी सुन्दरम् उस समय बनारस हिन्दू वि‍श्व‍वि‍द्यालय के कोर्ट एंड कॉउसिल के सदस्य थे और उस समय के कुलपति पंडित मदन मोहन मालविय जी के अनुरोध पर जो चाहते थे कि बनारस हिन्दू विश्चविद्यालय का एक ‍अधि‍कारीक इतिहास लिखा जाना चाहिये के कारण इस किताब को संपादित करने का जिम्मा लिया । और अंतत: यह किताब ‘’बनारस हिन्दू युनिवर्सि‍टी 1905-1935’’ रामेश्चर पाठक के द्वारा तारा प्र‍िटिंग वर्क्स, बनारस से मुद्र‍ित हुआ ।
यह पुस्तक बिकानेर के महाराजा गंगा सिंह जी के उस वक्तव्य को प्रमुखता से दिखाती है जब उन्होनें पहली बार मदन मोहन मालविय को इस वि‍श्व‍वि‍द्यालय के संस्थापक के रूप में सम्मान दिया था । यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि बिकानेर के महाराजा का इन सब परिदृष्य में पदार्पण 1914-15 में हुआ था ज‍बकि वि‍श्व‍वि‍द्यालय की परिकल्पना और प्रारूप 1905 से ही शुरू हो गयी थी । पुस्तक के पहले पन्ने पर लॉर्ड हॉर्डिग के उस भाषण का अंश दिया गया है जिसमे वो वि‍श्व‍वि‍द्यालय की नींव का पत्थर रखने आये थे । लेकिन उनकी पंक्त‍ियों में कहीं भी किसी व्यक्त‍ि का नाम नहीं लिया गया है । चौथे पैराग्राफ में उस बात की चर्चा की गई थी कि नींव के पत्थर के नीचे एक कांस्य पत्र में देवी सरस्वती की अराधना करते हुए कुछ संस्कृत के श्लोक लिखे गये थे । पांचवे  पैराग्राफ में लिखा गया था कि 
"The prime instrument of the Divine Will in this work was the Malaviya Brahmana, Madana Mohana, lover of his motherland. Unto him the Lord gave the gift of speech, and awakened India with his voice, and induced the leaders and the rulers of the people unto this end.”
और इसलिए ये प्रसिद्ध हो गया कि मालवीय जी ही इस वि‍श्व‍वि‍द्यालय के एकमात्र संस्थापक हैं ।
किताब के छट्ठे पैराग्राफ में संस्कृत में मालवीय जी ने बिकानेर के महाराजा गंगा सिंह जी, दरभंगा के महा‍राजाधि‍राज रामेश्वर सिंह जी के साथ कॉंउसलर सुंदर लाल, कोषाध्यक्ष गुरू दास, रास विहारी, आदित्या राम और ले‍डी वसंती की चर्चा की है । साथ ही युवा वर्गों के कार्यों और अन्य भगवद् भक्तों का जिक्र किया है जिन्होनें कई प्रकार से इस विश्वविद्यालय के निर्माण में सहयोग दिया । इस पैराग्राफ में रामेश्वर सिंह के नाम को अन्य भगवद् भक्तों के साथ कोष्टक में रखा था जिन्हाने सिर्फ किसी तरह से मदद की थी । ऐनी बेसेंट का जिक्र इस अध्याय में करना उन्होंने जरूरी नहीं समझा ।
जबकि 1911 में छपे हिन्दू विश्वविद्याल के दर्शनिका के पेज 72 में लेखक ने इस विश्वविद्यालय के पहले ट्रस्टी की जो लिस्ट छापी है उसमे उपर से दंरभगा के महाराज रामेश्वर सिंह, कॉसिम बजार के महाराजाश्री एन सुब्बा रॉव मद्रास, श्री वी. पी. माधव राव बैंगलौर, श्री विट्ठलदास दामोदर ठाकरे  बॉम्बे, श्री हरचन्द्र राय विशि‍नदास कराची, श्री आर. एन. माधोलकर अमरोठी, राय बहादूर लाला लालचंद लाहौर, राय बहादूर हरिश्चन्द्र मुल्तान, श्री राम शरण दास लाहौर, माधो लाल बनारस, बाबू मोती चंद और बाबू गोविन्द दास बनारसराजा राम पाल सिंह राय बरेली, बाबू गंगा प्रसाद वर्मा लखनउ, सुरज बख्श सिंह सीतापुरश्री बी. सुखबीर मुजफ्फरपुर, महामहोपाध्याय पंडित आदित्या राम भट्टाचार्य इलाहाबाद, डॉ सतीश चन्द्र बैनर्जी इलाहाबाद, डॉ तेज बहादूर सापरू इलाहाबाद और पंडित मदन मोहन मालविय इलाहाबाद  का नाम लिखा गया था ।
अध्याय तीन जो पेज नंबर 80 से शुरू होता में इस बात की चर्चा कही नहीं की गई है कि किस प्रकार ऐनी बेसेंट ने बनारस में अपने केन्द्रीय हिन्दू महाविद्यालय को द यूनीवर्सिटी ऑफ इंडियामें तब्दील करने की योजना बनाई । ना ही एक भी शब्द में उस ‘’शारदा विश्वविद्यालय’’ का जिक्र किया जिसका सपना महाराजा रामेश्वर सिंह ने भारत के हिन्दू विश्वविद्याय के रूप में देखा था और जिसको लेकर उन्होंने पुरे भारत वर्ष में बैठकें भी की थी । इस पुस्तक में सिर्फ इस बात की चर्चा हुई की किस प्रकार अप्रैल 1911 में पंडित मालवीय जी, श्रीमती ऐनी बैसेंट जी से इलाहाबाद में मिले थी और प्रस्तावों पर सहमती के बाद किस प्रकार डील फाइनल हुई थी । ( इस पुस्तक में ना तो बैठकों की विस्तृत जानकारी दी गई है ना ही समझौते के बिन्दूओ को रखा गया है) उसके बाद वो महाराजा रामेश्वर सिंह से मिले और तीनो ने मिलकर धार्मिक शहर बनारस में एक विश्वविद्यालय खोलने का फैसला किया । पृष्ठ संख्या 80-81 पर साफ लिखा गया है कि यह कभी संभव नहीं हो पाता कि तीन लोग एक ही जगह, एक ही समय तीन यूनीवर्सीटी खोल पाते और उनको सही तरीके से संचालित कर पाते लेकिन लेखक ने उस जगह ये बिल्कुल भी जिक्र नहीं किया की उन तीनों की आर्थ‍िक, राजनैतिक, सामाजिक और उस समय के सरकार में पहुंच कितनी थी । खैर...
प्राप्त दस्तावेज से पता चलता है कि तीनों के बीच सहमति के बाद महाराजाधि‍राज दरभंगा की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन कर लिया गया और तत्कालीन वॉयसराय और शि‍क्षा सचिव को पत्राचार द्वारा सूचित कर दिया गया गया । महाराजधि‍राज ने अपने पहले पत्र जो 10 अक्टूबर 1911 को अपने शि‍मला स्थ‍ित आवास से शि‍क्षा सचिव श्री हरकॉर्ट बटलर को लिखे थे में लिखा था -  भारत के हिन्दू समुदाय चाहते हैं कि एक उनका एक अपना विश्चविद्यालय खोला जाय । बटलर ने प्रतिउत्तर में 12 अक्टूबर 1911 को महाराजा रामेश्वर सिंह को इस काम के लिए शुभकमानाएं दी और प्रस्तावना कैसे तैयार की जाए इसके लिए कुछ नुस्खे भी दिये (पेज 83-85) । इस पुस्तक के पेज संख्या 86 पर लिखा गया है कि इस विश्वविद्यालय को पहला दान महाराजाधि‍राज ने ही 5 लाख रूपये के तौर पर दिया । उसके साथ खजूरगॉव के राणा सर शि‍वराज सिंह बहादूर ने भी एक लाख 25 हजार रूपये दान दिये थे ।
22 अक्टूबर 1911 को महाराजा रामेश्वर सिंह, श्रीमती एनी बेसेंट, पंडित मदन मोहन मालवीय और कुछ खास लोगों ने इलाहाबाद में एक बैठक की जिसमें ये तय किया गया कि इस विश्वविद्यालय का नाम ‘’हिन्दू विश्चविद्यालय’’ रखा जाएगा । यह दस्तावेज इस बात का भी सबूत है कि मदन मोहन मालवीय जी ने अकेले इस विश्वविद्यालय का नाम नही रखा था ।
28 अक्टूबर 1911 को इलाहाबाद के दरभंगा किले में माहाराजा रामेश्वर सिंह की अध्यक्षता में एक बैठक का आयोजन हुआ जिसमें इस प्रस्तावित विश्वविद्यालय के संविधान के बारे में एक खाका खीचा गया ( पेज संख्या 87) । पेज संख्या 90 पर इस किताब ने मैनेजमेंट कमीटी की पहली लिस्ट दिखाई है जिसमें महाराजा रामेश्वर सिंह को अध्यक्ष के तौर पर दिखाया गया है और 58 लोगों की सूची में पंडित मदन मोहन मालवीय जा का स्थान 55वां रखा गया है ।
इस किताब में प्रारंभि‍क स्तर के कुछ पत्रों को भी दिखाया गया है जिसमें दाताओं की लिस्ट, रजवाड़ों के धन्यवाद पत्र, और साथ ही विश्वविद्यालय के पहले कुलपति सर सुंदर लाल के उस भाषण को रखा गया है जिसमें उन्होंने पहले दीक्षांत समारोह को संबोधि‍त किया है ।  अपने संभाषण में श्री सुंदर जी ने महाराजा रामेश्वर सिंह, श्रीमती एनी बेसेंट और पंडित मदन मोहन मालवीय जी के अतुलित योगदान को सराहा है जिसके बदौलत इस विश्वविद्यालय का निर्माण हुआ । यहाँ गौर करने वाली बात ये भी है कि अपने संभाषण में उन्होंने कभी भी पंडित मदन मोहन मालवीय जी को संस्थापक के रूप में संबोधि‍त नही किया है ( पेज 296)। इस किताब के दसवें अध्याय में पंडित मदन मोहन मालवीय जी के उस संबोधन को विस्तार से रखा गया है जिसमें उन्होंने दिक्षांत समाहरोह को संबोधि‍त किया था । यह संबोधन इस मायने में भी गौरतलब है कि इस पूरे भाषण में उन्होंने एक भी बार महाराजा रामेश्वर सिंह, श्रीमती ऐनी बेसेंट, सर सुंदर लाल आदि‍ की नाम बिल्कुल भी नहीं लिया । उन्होंने सिर्फ लॉर्ड हॉर्डिग, सर हरकॉर्ट बटलर और सभी रजवाड़ो के सहयोग के लिए उन्हें धन्यवाद दिया ।
आज भारत के विभि‍न्न पुस्तकालयों, आर्काइव्स और में 1905 से लेकर 1915 तक के बीएचयू के इतिहास और मीटींग्स रिपोर्ट को खंगालने से यह पता चलता है कि जो भी पत्राचार चाहे वो वित्तीय रिपोर्ट, डोनेशन लिस्ट, शि‍क्षा सचिव और वायसराय के साथ पत्राचार, रजवाड़ाओं को दान के लिए पत्राचार हो यो अखबार की रिपोर्ट हो या नि‍जी पत्र आदि ऐसे तमाम दस्तावेज है जिसमें ना ही पंडित मदन मोहन मालवीय जी को इसके संस्थापक के रूप में लिखा गया है ना ही कोई भी पत्र सीधे तौर पर उन्हे लिखा गया है । पत्राचार के कुछ अंश जो इसमाद के पास है उससे साफ साबित होता है कि सभी पत्राचार महाराजा रामेश्वर सिंह जी को संबोधि‍त कर लिखे गये हैं । ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि बीएचयू के लिखि‍त इतिहास में जहां रामेश्वर सिंह को महज एक दानदाता के रूप में उल्लेखि‍त किया गया है और तमाम दानदाताओं की सूची के बीच रखा गया है । ऐसे व्यक्त‍ि‍ को इन तमाम दस्तावेजो में बीएचयू के आंदोलन के नेतृत्वकर्ता या फिर बीएचयू के आधि‍कारीक हस्ताक्षर के रूप में  संबोधन कैसे किया गया है । किसी संस्थान के महज दानकर्ता होने के कारण किसी व्यक्त‍ि के साथ ना तो ऐसे पत्राचार संभव है और न हीं ऐसा संबोधन संभव है । अगर इस आंदोलन के नेतृत्वकर्ता कोई और थे तो पत्राचार उनके नाम से भी होने चाहिये थे । वैसे ही अगर दानकर्ताओं के लिए यह एक संबोधन था तो ऐसे संबोधन अन्य दानदाताओं के लिए भी होने चाहिये थे । लेकिन ऐसे कोई दस्तावेज ना तो बीएचयू के पास उपलब्ध है और ना ही किसी निजी संग्रहकर्ता के पास । ऐसे में सवाल उठता है कि क्या रामेश्वर सिंह महज एक दानदाता थे या फिर उन्हें दानदाता तक सिमित करने का कोई सूनियोजित प्रयास किया गया ।
तमाम दस्तावेजों को ध्यान रखते हुए यह कहा जा सकता है कि बीएचयू का वर्तमान इतिहास उसका संपूर्ण इतिहास नहीं है और उसे फिर से लिखने की आवश्यकता है । अपने सौ साल के शैक्षणि‍क यात्रा के दौराण बीएचयू ने कभी अपने इतिहास को खंगालने की कोशि‍श नहीं की । 2016 में बीएचयू की 100वीं वर्षगांठ मनाया जायेगा । ऐसे में बीएचयू के इस अधूरे इतिहास को पूरा करने की जरूरत है ।

(मूल आलेख तेजकर झा)                                                            साभार : www.esamaad.com 

Tuesday, October 4, 2011

उत्‍तर बिहार में शास्‍त्रीय संगीत की सूखती रसधार



आशीष झा
अगर हम उत्‍तर बिहार में शास्‍त्रीय संगीत के इतिहास पर गौर करें तो यह साबित होता है कि इस इलाके ने बिहार के सामाजिक और संस्‍कृतिक जीवन में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा की है। लोक नृत्‍य संगीत ही नहीं, अभिजात्‍य संगीत की परंपरा भी भूलाई नहीं जा सकती। यहां के लोग संगीत को जीवन का अभिन्‍न अंग मानकर उसे विकसित करते रहे हैं। यही कारण है कि मिथिला के लोक गीतों में भी शास्‍त्रीयता की गहरी छाप देखी जा सकती है। कभी ख्‍याल और ध्रुपद की उत्‍तर बिहार खासकर मिथिला में तूती बोलती थी, आज वह रसधार सूख चुकी है। आम लोगों की बात तो दूर उन घरानों में भी संन्‍नाटा पसरा है। कहीं संगीत के प्रति वह पागलपन देखने को नहीं मिलता। कहने के लिए अब भी इन घरानों की नई पीढी रोज रियाज कर रही है, लेकिन फिर भी उत्‍तर बिहार में शास्‍त्रीय संगीत के प्रति लोगों में वो जिज्ञासा नहीं देखी जा रही है, जो दिखनी चाहिए। आज ध्रुपद की अपेक्षा ख्‍याल गायकी के प्रति युवाओं में इच्‍छा देखी जा रही है। संरक्षकों का अभाव या फिर संगीत से टूटते रिश्‍ते, कारण जो भी हो, लेकिन गायकों के रियाज मे भी वह अनुशासन नहीं दिखता, जो इनके पूर्वजो में पाया जाता था। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि 250 साल से अधिक पुरानी उत्‍तर बिहार की शास्‍त्रीय गायकी की धारा अगर सूखी नहीं है, तो उसमें वो बहाव भी नहीं रहा।

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कर्नाट वंश की देन है शास्‍त्रीय संगीत
मिथिला मे संगीत का इतिहास 11वी सदी से मिलता है। उस वक्‍त इस क्षेत्र पर सिंहराव के कर्णाट वंश का शासन था। उस समय इस वंश केशासक न्‍यायदेव (1097-1134) ने संगीत को स्‍थापित करने मे अहम भूमिका निभाई। मिथिलेश न्‍यायदेव उच्‍च कोटि के कला जोहरी तो थे ही खुद भी महान संगीतज्ञ थे। उन्‍होंने रागों का सम्‍यक विश्‍लेषण और वर्गीकरण कर राग संगीत को नई दिशा प्रदान की। उनके द्वारा लिखि गई पुस्‍तक सरस्‍वती ह़यदालंकार की पांडुलिपि आज भी पुणे मे सुरक्षित है। वैसे यह पुस्‍तक भारत भाष्‍य के नाम से भी प्रसिद्ध है। उनके समकालीन मिथिला के भोज, सामश्‍वर, परमर्दी, शारंगदेव आदि भारतीय संगीत के महान शास्‍त्रकार हुए। खडोरे वंश के मिथिला नरेश शुभंकर (1516-1607) को कुछ विद्वान बंगाल निवासी मानते हैं, लेकिन अधिकांश लोगों का मानना है कि वे मिथिलावासी थे। ल्‍वेयन भी अपने रागतिरंगनी मे इनका एक मैथिल के रूप मे ही जिक्र करते हैं। शुभंकर ने संपूर्ण संगीत को एक नई उंचाई प्रदान की श्रीहस्‍तमुक्‍तावली के साथ साथ उन्‍होंने संगीत दामोदर की रचना की। संगीत दामोदर मे ही पहला मैथिल राग शुभग का उल्‍लेख मिलता है। इस ग्रंथ मे पहली बार 101 तालों की चर्चा की गई है। शुभंकर ने इस ग्रंथ मे यह भी साबित करने की कोशिश की है कि बीना के 29 प्रकार हैं। मार्गी संगीत को मिथिला में मान्‍यता ही नहीं भरपूर आनंद भी मिलता है। कर्नाट वंश के अंतिम राजा मिथिलेश हरि सिंह देव के दरबारी मैथिल विद्वान और कुशल संगीतज्ञ ज्‍योतिश्‍वर ठाकुर 14वी सदी के कलावंत का उल्‍लेख विद्वावंत के रूप मे किया है। ज्‍योतिश्‍वर ने पहली बार 18 जाति, 22 श्रुति और 21 मुर्च्‍छना की खोज की। चूंकि न्‍यायदेव कर्नाट से आए थे जाहिर है कि वे अपने साथ कर्नाटीय पद्धति भी लाए होंगे। इस संबंध मे कला विद्वान गजेंद्र सिंह कहते हैं कि बहुत संभव है कि मिथिला का प्रथम विख्‍यात राग तिरहुत मूलत: कर्नाट पद्धति की ही देन हो। मिथिला के विख्‍यात संगीतका, शास्‍त्रकार और राग तिरंगीनी के प्रणेता लोचन कवि (1650-1725) ने मिथिला मे रागों की उत्‍पत्ति नाद-तिरुपण और तिरहुत देस मे प्रचलित राग गीत, छंद, ताल आदि की सविस्‍तार चर्चा की है। ऐसे कई रागों का जन्‍म उन्‍होंने इस ग्रंथ के माध्‍यम से दिया जिसकी मिथिला को संगीत की बंलंदियों पर ला खडा किया। इस ग्रंथ मे कई ऐसे राग मौजूद हैं। लोचन ने आडाना जैसे रागों को रच कर मिथिला की शास्‍त्रीय संगीत परंपरा को एक ठोस आधार प्रदान किया। समस्‍त भारत इस बात पर एक मत है कि मध्‍य काल मे रागतरंगिनी उत्‍तर भारतीय संगीत का मानक ग्रंथ है। मध्‍य काल मे मैथिल संगीतज्ञों की पूरे भारत मे धूम रही। इस कालखंड मे मिथिला के संगीतज्ञों ने बंगाल व उत्‍तरप्रदेश मे काफी ख्‍याति अर्जित की। पीसी बागची की रचना भारत और चीन के अनुसार 7वीं से 10वीं सदी में इनकी धूम चीन मे भी काफी थी। मिथिला के बुधन मिश्र 12वीं सदी के महान कवि जयदेव के समकालीन थे। उत्‍तर प्रदेश से त्रिपुरा तक अपने संगीत का जोहर दिखानेवाले इस संगीतज्ञ ने एक बार जयदेव को भी ललकारा था। अपने समय के इस सबसे बडे संगीत प्रतियोगिता मे बुधन मिश्र ने विजय प्राप्‍त कर मिथिला का परचम पूरे देश मे लहराया था। कर्नाट वंश के मिथिला नरेशों मे न्‍यायदेव से लेकर हरिसिंह देव (1303-26) तक छह पुश्‍तों मे संगीत की परंपरा प्रबल रही। मुस्लिम आक्रमण के कारण 1326 मे हरिसिंह देव नेपाल जाकर बस गए। वहां हरिसिंह ने नेपाली संगीत को संवारा और संपन्‍न किया।

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यहां निर्मित कुछ राग
उत्‍तर बिहार की जमीन पर कई राग रचे गए। यहां रचे अधिकतर राग या तो राग निर्माताओं के साथ ही खत्‍म हो गए या फिर कुछ एक घराने में पीढियों के पास सुरक्षित है। बेतिया के संगीतप्रेमी नरेश आनंद किशोर द्वारा निर्मित ध्रुपद संगीत के ग्रंथ आनंद सागर में कई ऐसे रागों का जिक्र मिलता है जिसका जिक्र और कहीं उपलब्‍ध नहीं है। इन रागों में राग सुरह, राग शंख, राग सिंदुरा मल्‍हार आदि महत्‍वपूर्ण कहे जाते हैं। लोचन ने भी कई ऐसे रागों का निर्माण या रचना की जो केवल तिरहुत में ही गाये जाते हैं। लोचन द्वारा रचित रागों में गोपी बल्‍लब, बिकासी, धनछी, तिरोथ, तिरहुत आदि प्रमुख कहे जाते हैं। दरभंगा के महाराजा रामेश्‍वर सिंह के नाम पर रामेश्‍वर राग का भी यहां निर्माण हुआ था। इस प्रकार का जिक्र भी पुस्‍तकों में मिलता है। मिथिला में रचित अन्‍य रागों में राग मंगल, राग देस, राग स्‍वेत मल्‍हार, रत्‍नाकर व भक्‍त विनोद आदि प्रमुख हैं।

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ध्रुपद मैथिली संगीत का एक ध्रुव
शारंदेव ने 13वीं सदी में प्रबंध के लगभग 300 प्रकारों का वर्णन किया। उनमें से एक प्रबंध सालगसूड के अवयबों मे ध्रुव का जिक्र मिलता है। माना जाता है कि ध्रुव से ही ध्रुपद का प्रदुभाव हुआ। स्‍थाई अंतरा संचारी और अभोग में शब्‍द स्‍वर तथा लय का जैसा सुंदर संमवित स्‍परूप ध्रुपद मे देखने को मिलता है वैसा अन्‍य किसी गेय विधा मे नहीं मिलता। इसी लिए ध्रुपद को हिंस्‍दुस्‍तानी संगीत का ब्राहमण कहा जाता है। प्राचीन काल में ध्रुपद एक समूह गायन था जिसको मूगल काल मे एकल प्रस्‍तुति किया जाने लगा। दरसल ध्रुपद गायकी गंभीर प्राचीन होने के साथ अध्‍यात्‍मिक भक्ति का सृजन करता है। जिसको साधक शांत भाव से और धीर गंभीर गमक आदि द्वारा ध्रुपद गायन को व्‍यक्‍त करता है। उत्‍तर बिहार मे ध्रुपद की दो परंपराएं विकसित हुई जो बेतिया और दरभंगा राज्‍य के संरक्षण मे फलती-फूलती रही। इन दोनों घरानों मे बेतिया घराना प्राचीन है। इस घराने का उदभव 17वीं सदी के आसपास माना जाता है। इन दोनों राजवारे के शासन ने केवल इन दोनों घरानों को संरक्षण नहीं दिया बल्कि इन राजवारों के राजा स्‍वयं उच्‍च कोटी के संगीतज्ञ भी थे। उत्‍तर बिहार मे ध्रुपद गायन और धराने को स्‍थापित करने का श्रेय बेतिया के राजा गज सिंह को जाता है।
दरभंगा के मल्लिक घराना लगभग 250 साल पुराना है। प्रख्‍यात लोक गायिका जयंती देवी के अनुसार राधाकृष्‍ण और कर्ताराम नामक दो भाई मिथिला नरेश माधव सिंह( 1775-1807) के शासन काल में पश्चिम भारत शायद राजस्‍थान से दरभंगा आए। प्रख्‍यात ख्‍याल गायक रामजी मिश्र का कहना है कि नींव किसी ने भी रखी हो लेकिन दरभंगा घराने के प्रथम नायक छितिपाल मल्लिक थे। 1936 मे मुजफ़फरपुर के संगीत मर्मज्ञ बाबू उमाशंकर प्रसाद द्वारा आयोजित अखिल भारतीय संगीत सम्‍मेलन मे दरभंगा घराने के महावीर व रामचतुर मल्लिक बंधु द्वारा ऐसा युगल गायन प्रस्‍तुति किया गया कि वहां आए सभी गुणीजनों ने एक मत से उन्‍हें संगीताचार्य की उपाधि से विभूषित किया। बाद में भारत सरकार ने रामचतुर मल्लिक और सियानाम तिवारी को पद़मश्री से नवाजा।
आज ध्रुपद मिथिला के लिए अंजान बन चुका है। इसके संबंध में बतानेवाले भी कम हो चुके है। दरभंगा स्थित ध्रुपद विद्यालय भी कहने मात्र को है। संगीत का कोई बडा आयोजन पिछले 22 साल से नहीं हुआ है। अच्‍छे कलाकार क्षेत्र छोड चुके हैं।
आज ध्रुपद की अपेक्षा ख्‍याल गायकी के प्रति युवाओं में इच्‍छा देखी जा रही है। इसका कारण ख्‍याल की लोकप्रियता और आर्थिक पक्ष माना जा रहा है। उत्‍तर बिहार में इस रुझान को बढावा देने का काम रामजी मिश्र ने किया। कभी ध्रुपद गाने वाला मधुबनी घराने के वारिस रामजी मिश्र की ख्‍याति आज ध्रुपद से ज्‍यादा ख्‍याल गायन से है। इन्‍होंने अपने पिता आद्या मिश्र से ध्रुपद की शिक्षा ली, लेकिन बाद में इनका रुझान ख्‍याल की तरफ हुआ और फिर ख्‍याल की विधिवत शिक्षा ग्रहण कर 1956-58 में इन्‍होंने राष्‍टपति से स्‍वर्ण पदक प्रप्‍त किया। मिश्र के पास जहां घराने से मिली ध्रुपद गाने की क्षमा दिखी, वहीं ख्‍याल गायकी के प्रति व्‍यक्तिगत रुझान के कारण ख्‍याल गायकों में अपनी एक अलग पहचान देश भर में बना लिया। रामजी मिश्र ने दरभंगा स्थित मिथिला विश्‍वविद्यालय में संगीत विभाग खुलवाने में अहम भूमिका निभाई।


बेतिया घराना
बेतिया घराना उत्‍तर बिहार का पहला संगीत घराना है। इस घराने का उदभव 17वीं सदी के आसपास माना जाता है। उत्‍तर बिहार मे ध्रुपद गायन और इस घराने को स्‍थापित करने का श्रेय बेतिया के राजा गजसिंह को जाता है। दिल्‍ली दरबार के अंत के साथ ही वहां के गवैये को छोटे राजाओं की जरूरत महसूस होने लगी। इस क्रम मे राजा गजसिंह ने कुरूक्षेत्र के पास के एक गांव के गवैयों चमारी मल्लिक (गायक) और कंगाली मल्लिक (बीनकार) को अपने साथ बेतिया लाकर दरबार का प्रमुख संगीतज्ञ नियुक्‍त कर दिया। यही से इस घराने का शुभारंभ माना जाता है। बेतिया घराने के ध्रुपदिय गायक अपने गायन मे संक्षिप्‍त अलाप और बेलबाट वर्जित रखते हैं। ये संपूर्ण गायन के लय मे कोई बदलाव नहीं करते। इस घराने के गायकों के गायन मे ख्‍याल की तरह विस्‍तार भी वर्जित है। दंदिशया रचनाओं मे फेरबदल किये बिना रागानुकुल गायन इनकी सबसे प्रमुख विशेषता है। अंतिम सोनिया उस्‍ताद अली खां से प्राप्‍त ध्रुपद की बंदिशें केवल बेतिया घराने मे ही उपलब्‍ध था। बेतिया घराने के दिग्‍गज ध्रुपदियों की वंश परंपरा को महंत मिश्र ने अपने कंधो पर उठाया रखा। आज इस घराने का दारोमदार पंडित इंद्रकिशोर मिश्र के कंधे पर है। उनकी बेटी इस घराने की उम्मीद है।
आज यह घराना अपने स्‍वर्ण काल मे नहीं है लेकिन यह सुखद आश्‍चर्य है कि 200 साल पहले बेतिया नरेश द्वारा लगाई गई इस संगीत बगिया के ये फूल मुडझाते हुए भी अपनी खूशबू बिखेरने में अभी भी संक्षम हैं। फिर भी इतना तो मानना ही पडेगा कि फूल मुडझा चुके हैं।
इस घराने के अनमोल रत्‍न : गोपाल मल्लिक, कांके मल्लिक, फजल हुसैन, काले खां, श्‍यामा मल्लिक, उमाचरण मल्लिक, गोरख मल्लिक, राजकिशोर मल्लिक, महंत मल्लिक, शंकरलाल मल्लिक आदि प्रमुख है।

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दरभंगा घराना
दरभंगा के मल्लिक ध्रुपदियों की परंपरा कोई 200 साल की है। राधाकष्‍ण और कर्ताराम नामक दो भाई मिथिला नरेश माधव सिंह (1775-1807) के शासन काल मे पश्चिम भारत शायद राजस्‍थान से दरभंगा आए। ये लोग दरभंगा के मिश्रटोला मे बस गए। बाद मे महाराज ने इन लोगों को अमता गांव के पास गंगदह मे जमीन देकर बसा दिया। कहा जाता है कि इन्‍होंने ही दरभंगा घराने की नींव रखी। दरभंगा के मल्लिक ध्रुपदीय गौडबानी ध्रुपद गाते हैं। गौडबानी ध्रुपद मे स्‍वर विस्‍तार की जो संयोजन करते हैं, वो रंजकता से परिपूर्ण है और उदभुत होती है। यही इनकी पंडित्‍यपूर्ण गायकी की और संबल परंपरा को दिखाती है। दरभंगा घराने के गायन की विशेषता यहां के गायकों के नोम-तोम की अलापचारी मे है। दरभंगा घराने की छाप मिथिला समाज पर यहां तक देखी जाती है कि मिथिला के अधिकतर परंपरागत लोक गीतों की बंदिश ख्‍याल मे न होकर ध्रुपद मे ही की हुई है। यह महज दुर्भाग्‍य है कि मैथिल कोकिल विद्यापति की रचनाओं को उस हद तक ध्रुपद मे अब तक नहीं गाया जा सका है। दरभंगा घराने के दो गायकों को भारत सरकार ने पद़मश्री से नवाजा है। सबसे पहले इस सम्‍मान पंडित रामचतुर मल्लिक को दिया गया और बाद में सियाराम तिवारी को इस सम्‍मान से नवाजा गया। दरभंगा मे घ्रुपद का आखरी बडा आयोजन हुए 20 साल बीत चुके हैं। इस घराने के अधिकतर प्रतिनिधि मिथिला को छोड अन्‍य प्रदेशों मे रह रहे हैं। वैसे राम कुमार मल्लिक दरभंगा में हैं और उनके तीन पुत्र और पुत्री इस परंपरा को आगे ले जाने में लगे हुए हैं। लेकिन इस मामले में दरभंगा को सबसे बडा झटका तब लगा जब विदुर मल्लिक यहां से विदा हुए। विदुर मल्लिक रामचुतुर मल्लिक के बाद सबसे कुशल गायक थे। मिथिला की लोक गायिका जयंती देवी का कहना है कि विदुर का जाना एक प्रकार से यहां से ध्रुपद का जाना कहा जा सकता है। वे कहती हैं कि विदुर को अभय के समान रामचतुर जी ने प्रमोट नहीं किया, फिर भी विदुर ने जो स्‍थान ध्रुपद के क्षेत्र में बनाया वो दरभंगा घराने की माटी में बसे संगीत को ही साबित करता है। विदुर जरूर मिथिला को छोड वृदांवन में जा बसे, लेकिन वे कभी दरभंगा से जुदा नहीं हो सके। इसी प्रकार अभय नारायण मल्लिक खैडागढ, जबकि विदुर मल्लिक के पुत्र प्रेमकुमार मल्लिक इलाहाबाद मे जा बसे। जो कुछ भी हो आज दरभंगा खुद इस घराने के प्रति अंजान हो चुका है। लेकिन उम्मीद कभी कायम है। इस घराने ने प्रियंका के रूप में जहां पहली महिला गायिका पा लिया है, वहीं मल्लिक परिवार की 13वीं पीढ़ी के आठ गायकों ने इस उम्मीद को पुख्ता किया है कि इतिहास दोहरा सकता है।

इस घराने के अनमोल रत्‍न : कर्ताराम मल्लिक, कन्‍हैया मल्लिक, निहाल मल्लिक, रंजीतराम मल्लिक, गुरुसेवक मल्लिक, कनक मल्लिक, फकीरचंद मल्लिक, भीम मल्लिक, पद़मश्री सियाराम तिवारी आदि।

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मिथिला के ख्‍यालों में जा बसा ख्‍याल
ख्‍याल का अर्थ ही है कल्‍पना या अपनी कल्‍पना से स2जन करना। अर्थात ख्‍याल गायक अपनी साधना में गंभीरता के साथ साथ चंचल प्रक2ति को भी दिखाता है। इसे दिखलाने के लिए गायक अपने गले मे अधिक तैयारी मुरछना, तान तथा लयों के विभिन्‍न प्रकारों को आ‍कर्षक ढंग से श्रोताओं के समक्ष प्रस्‍तुति करता है। अभिजात्‍य संगीत के अंतर्गत न केव ध्रुपद बल्कि ख्‍याल विशेष कर ठुमरी की सम2द्ध परंपरा मिथिला मे रही है। यद्यपि ध्रुपद के समान मिथिला मे ख्‍याल का कोई बडा घराना नहीं हुआ। लेकिन कुछ एक छोटे घराने व कुछ महान कलाकारों ने इसे मिथिला मे स्‍थापित ही नहीं बल्कि अपने गायन से दुनिया को सम्‍मोहित किया। ख्‍याल गायकों मे सबसे उल्‍लेखनीय स्‍थान पूर्व मिथिला के बनैली राज्‍य के कुमार श्‍यामानंद सिंह का है। इनको ख्‍याल से विभिन्‍न घराने के पुराने गुणिजनों से मार्गदर्शन प्राइज़ था। कुमार साहब पेशेवर गायक नहीं थे, लेकिन उनकी ख्‍याति का प्रमाण इसी से लगाया जा सकता है कि उस्‍ताद बिलायत हुसैन उन्‍हें उत्‍तर भारत का सर्वर ख्‍याल गायक मानते थे। गजेंद्र नारायण सिंह की पुस्‍तक में मिथिला के एक और महान ख्‍याल गायक का जिक्र मिलता है। पंचगछिया (सहरसा) के रायबहादुर लक्ष्‍मीनारायण सिंह का टहलू खबास (नौकर) मांगन अपने समय का महान ख्‍याल गायक था। उसकी ख्‍याति दूर देश तक फैली हुई थी। उसने ओंकारनाथ ठाकुर को भी अपने गायन से प्रभावित किया था। रसभरी ठुमरी गायन मे उसका कोई जोर नहीं था। कहा जाता है कि वह जब मेघ जैसा वर्षाकालीन राग गाता था तो आसमान मे बादल छा जाते थे। 1936 के आसपास मंगन ने बंगाल और पूर्वी प्रदेशों मे अपने गायन की गहरी छाप छोडी। इसी दौरान मंगन पंचगछिया से दरभंगा आ गए। वह जल्‍दी ही दरभंगा के संगीत प्रेमी राजबहादुर विशेश्‍वर सिंह का खास गायक बन गए। संगीत जगत के लिए इसे अभिशाप ही कहेंगे कि इस अदभुत गायक का ना तो रिकार्ड ही बन पाया और न ही कोई तसवीर ही खींची जा सकी। मंगन जैसा उदाहरण शायद ही विश्‍व में कहीं और मिले जो एक चाकर से महान गायक बन गया।
ख्‍याल गायकों पनिचोभ मधुबनी) के गायकों का भी महत्‍वपूर्ण स्‍थान माना जाता है। इस धराने के सबसे विलक्ष्‍ण गायक अबोध झा 1840-1890) के पुत्र रामचंद्र झा(1885) थे। वैसे ये बनैली राज घराने में गाया करते थे, लेकिन इनका गायन दरभंगा राज दरबार में भी होता रहता था। ख्‍याल गायकी का बगिया आज बागवान का इंतजार कर रहा है।

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स्‍मरण
ए रामचतुरबा तू का गैवे

दरभंगा राज का दरबार हॉल श्रोताओं से भरा हुआ था। महाराज और उनके छोटे भाई कजनी बाई की ठुमरी का आनंद ले रहे थे। कजनी बाई की ठुमरी खत्‍म होते ही राजाबहादुर ने रामचतुर मल्लिक को गाने का आदेश दिया। ध्रुपद के इस गायक को ठुमरी गाने का आदेश सुन कजनी बाई से रहा न गया। उसने मुस्‍कुराकर कहा- ए रामचतुरबा तू का गैवे। रामचतुर मल्लिक बिना कुछ बोले ठुमरी की बंदिश गाने लगे। कुछ ही पल बाद कजनी बाई ने एक और बंदिश सुनने की ख्‍वाइश जाहिर की। ध्रुपद के इस महान गायक का मानना था कि जो ध्रुपद गा सकता है वो सब कुछ गा सकता है। दरभंगा घराने के इस रत्‍न का जन्‍म 1902 से 1907 के बीच बताया जाता है। लेकिन अधिकतर लोगों का मत है कि उनका जन्‍म 1907 मे दरभंगा के अमता गांव में हुआ था। पंडित जी के पडोसी होने के नाते मुझे उन्‍हें देखने और सुनने का मौका मिला। लेकिन बचपन की मस्‍ती ने कभी बैठकर या रूक कर उन्‍हें सुनने न दिया। जब भी कभी हमारे मित्र मुझे हकलाने पर चिढाते थे, पंडित बाबा मुझे कहा करते थे कि गा कर बात कर, नहीं गहलाएगा। पंडित जी का लोहा डागर बंधु भी मानते थे। उन्‍हें केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी अवार्ड और भारत सरकार द्वारा पद़मश्री से नवाजा गया, वहीं खैरागढ विश्‍वविद्यालय ने डॉक्‍टर की उपाधि देकर उन्‍हें सम्‍मानित किया। रामचतुर मल्लिक मिथिला की संगीत परंपरा को सुदूर यूरोपीय देशों तक ले गए। उनके पास प्रचीन बंदिशों का खजाना था। उस्‍ताद फैयाज खां के बाद वही एक मात्र गायक हुए जो चारों पट कुशलतापूर्व गा सकते थे। बिहार सरकार की बेरुखी और लंबी बीमारी ने इस महान गायक को हमेशा के लिए खामोश कर दिया। जनवरी 1990 में उनके निधन से मिथिला की रसधार सूख गई। रामचतुर मल्लिक के बाद मिथिला मे ध्रुपद का एक प्रकार स अंत ही हो गया। आज मिथिला में ध्रुपद को बचाना ही उनके प्रति सच्‍ची श्रद्धांजलि होगी।


व्‍यवसायिकता से दूर एक कला साधक
कुमार श्‍यामानंद सिंह की भतीजी की शादी में खास तौर पर पंडित जसराज को गाने के लिए बनैली बुलाया गया। सुबह जसराज ने मंदिर में किसी को भजन गाते सुना। वहां जाने पर गानेवाला और कोई नहीं कुमार साहब खुद थे। भजन सुनते-सुनते जसराज रोने लगे। पूछने पर उन्‍होंने कहा कि जो भजन ऐसा गा सकता है वो ख्‍याल कैसा गाएगा। रात की महफिल में जसराज कुमार साहब से कई ख्‍याल की बंदिश सुनी। कुमार श्‍यामानंद सिंह का जन्‍म पूर्व मिथिला के बनैली राज घराने में हुआ। कुमार साहब पेशेवर गायक नहीं थे। यही कारण है कि आधुनिक गायक उनके विषय में कम ही जानते हैं। लेकिन कुमार साहब की संगीत में गहरी पैठ थी। वे कई बडे गबैये को अपना कायल बना चुके थे। प्रख्‍यात केसर बाई केरकर के साथ घटी घटना का जिक्र गजेंद्र नारायण सिंह अपनी पुस्‍तक में किया है। 1946 की एक महफिल में केसर बाई कुमार साहब की बंदिश सुनकर उनसे गंडा बांधने के लिए तैयार थी। इस बंदिश का स्‍थाई तो केसर बाई ने अपने गले में उतार लिया, लेकिन अंतरा नहीं उठा सकी। इसका उन्‍हें मरते दम तक गम रहा। इस प्रकार की एक और घटना का जिक्र उक्‍त किताब में किया गया है। कहरवे अवध एक बंदिश में कुमार साहब के साथ संगत कर रहे मशहूर तबला वादक लतीफा के हाथ तबले पर ही धरे रह गए। कुमार साहब के एक रिश्‍तेदार का कहना है कि कुमार साहब का मानना था कि ताने अलंकार हैं। अलंकार धारण करने के लिए आधार यानि शरीर चाहिए। और बंदिश वही शरीर है।
1986 में दरभंगा में आयोजित ध्रुपद समारोह में कुमार साहब ने भी भाग लिया था। तभी मुझे भी उनसे मिलने का मौका मिला। संयोग से वे हमारे नाना के घर पर ही रुके थे। कुमार साहब जब रियाज करते थे, तो संगीत नहीं जाननेवाला भी रुक कर उन्‍हें सुनने लगता था। ख्‍याल गायकी की जो कल्‍पना क्षमता उनमें थी शायद ही ऐसी क्षमता मिथिला में फिर देखने को मिले। कुमार साहब आज हमारे बीच नहीं हैं। उनका निधन 1995 में हो गया।

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परंपरा बचाने में लगे कुछ कला साधक

संगीत कुमार नाहर : बेतिया घराने में 1956 में जन्‍में संगीत कुमार नाहर बचपन से ही गायन की बानगी प्रस्‍तुत करने लगे। अपने दादा बद्रीनाथ मिश्र और पिता प्रह़लाद मिश्र से उन्‍होंने संगीत की शिक्षा प्राप्‍त की। आकाशवाणी में काम करते हुए बेतिया की संगीत परंपरा को बचाने में इन्‍होंने काफी योगदान दिया है। मिश्र एक कुशल संगीत रचनाकार के रूप में भी समस्‍त भारत में जाने जाते हैं। बेतिया घराने में आर्थिक बदहाली के बाद भी संगीत नाहर जैसे बंशजों कुछ ऐसी बंदिशें बचा रखी हैं जो और कहीं सुनने को नहीं मिलता है।

अभयनारायण मल्लिक : दरभंगा घराने के ध्रुपदियों की परंपरा को अभयनारायण मल्लिक आगे बढाने में लगे हुए हैं। अभयनारायण मल्लिक का जन्‍म 1938 में दरभंगा में हुआ। अभय नाराण ध्रुपद के महान गायक रामचतुर मल्लिक के शिष्‍य हैं। दरभंगा के संगीत प्रेमी राजबहादुर विश्‍वेश्‍वर सिंह का इन्‍हें आशिष प्राप्‍त था। ये अपने चाचा के समान ही ध्रुपद के साथ-साथ ठुमरी भी आसानी से गाने की क्षमता रखते हैं। केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी फलोशिप प्राप्‍त इस गायक ने मिथिला की गौरवशाली ध्रुपद परंपरा को सुदूर देश रोम और जर्मनी तक पहुंचाया। अभय नारायण का एचएमभी ने कई रिकार्ड और कैसेट भी निकाला है।

प्रेम कुमार मल्लिक : रामचुतुर मल्लिक के बाद दरभंगा घराने के सबसे कुशल ध्रुपद गायक विदुर मल्लिक के पुत्र प्रेमकुमार मल्लिक आज इस परंपरा को बचाए रखने में संघर्षरत हैं। देश में आज ध्रुपद गायकों में प्रेम कुमार का विशेष स्‍थान है। इनका जन्‍म दरभंगा में हुआ। प्रेम कुमार ने अपने गायन 1983 में यूरोपीय श्रौताओं को मोहित करने में वही सफलता हासिल की जो कभी उनके दादा रामचतुर मल्लिक ने की थी। प्रेम कुमार मल्लिक को 1980 मे राष्‍टपति से स्‍वर्ण पदक मिला और इन्‍होंने इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में अपनी गायन कुशलता को छात्रों में बांटी। आज इनके पुत्र और पुत्री प्रशांत मल्लिक और प्रियंका मल्लिक इस घराने की विशाल परंपरा को अपने कंधे पर उठाने को तैयार हैं।

बिहारी : बिहारी जी का जन्‍म 1966 में बनैली के राज परिवार में हुआ। अपने पिता कुमार श्‍यामानंद सिंह के समान ही इनको भी ख्‍याल गायकी में अच्‍छी पकड हासिल है। पिता के समान बिहारी भी पेशेवर गायक नहीं हैं। लेकिन जमींदारी चले जाने के कारण पिता के समान वे निजी तौर पर महफिलों का आयोजन नहीं कर पाते हैं। वैसे डागर बंधुओं ने उनके गायन में पिता की झलक देखने का दावा कर चुके हैं।
( मेरा यह आलेख 2001 में प्रभात खबर में छपा था, कुछ संशोधन के साथ यहां रख रहा हूं। )

Sunday, June 12, 2011

मिथिला की सामाजिक स्थिति: एक समाजशस्त्रीय अवलोकन

हेतुकर झा

ऐतिहासिकता , इतिहास बोध एवं ’आधुनिक इतिहास लेखन’ के प्रसंग पश्चिम के विद्वानों के बीच चिन्तन 18वीं सदी से प्रारम्भ हुआ।1 इनलाइटेन्मेंट के मूल सिद्धान्त ”ऐब्सट्रैक्ट लॉज“ जिसके तहत सामाजिक विभिन्नताओं और उसके इतिहास की उपेक्षा निहित थी2, के विरूद्ध जर्मनी के प्रसिद्ध चिन्तक जे. जी. हर्डर 1774 ई. में इतिहास की प्रासंगिकता और प्रधानता के पक्ष में अपनी पुस्तक - ए फिलासफी ऑफ हिस्टरी फॉर द एजुकेषन ऑफ ह्यूमैनिटी के जरिये तर्कपूर्ण विचार प्रस्तुत किये - इससे इतिहास के पक्ष में विद्वानों का सोच आगे बढ़ा। फिर रोमान्ट्सििस्ट्स विचार धारा बाले, उत्‍तरकालीन कान्ट के आदर्शवाद और मध्य 19वीं सदी के डार्विनिज्म , सब, एक के बाद दूसरे, के सम्मिलित प्रभाव से ऐतिहासिक दृष्टि की सामाजिक सत्यता प्रसंग औचित्य की, सार्थकता की पुष्टि होती गई, और, हिस्टोरिसिज्म , अर्थात् सामाजिक सत्यता की व्याख्या ऐतिहासिक आधार पर करनें की बात आगे आई।3 19वीं सदी के अन्त तक तीन प्रकार के हिस्टोरिसिज्म : ”नैचुरिलिस्टिक“ “मेटाफीजिकल“ और ”एस्थेटिक“ हिस्टोरिसिज्म तथा प्रसिद्ध ऐतिहासिक चिन्तक रैन्के से प्रेरित ”ऑब्जेक्टिव“ तिहास की धाराएँ दृष्टिगोचर थी। रैन्के की दृष्टि में इतिहासकार का काम मात्र ऐतिहासिक ”फैक्ट्स“ के शोध, संचयन, संकलन तक ही सीमित था - उसके मूल्यांकन का नहीं। 20वीं सदी के आरम्भिक काल में समाजशास्त्र के दो प्रधान संस्थापक - मैक्स वेबर4 और दुरखाईम5 इतिहास और समाजशास्त्र के अन्योन्याश्रय सम्बन्ध की ओर इशारा किये। मियेनेके और क्रोचे जैसे इतिहास-चिन्तकों ने वर्तमान के प्रश्‍नों एवं समस्याओं के सन्दर्भ में ही इतिहास अन्वेषण, मूल्यांकन, एवं परीक्षण को स्थापित किये - नैचुरलिस्टिक हिस्टोरिसिज्म के तहत ये सारे झुकाव इतिहास और समाजशास्त्र को इतना करीब ले आया कि 1920 के दशक से जर्मनी में हिस्टोरिकल सोशियोलोजी विकसित होने लगा। इसके तहत टेलियोलौजिकल , इवोल्यूशनरी और सिर्फ किसी एक आधार पर आश्रित इतिहास को हिस्टोरिकल सोशियोलोजी या सोशियोलोजिकल हिस्टरी में कोई जगह नहीं दी गई।6 लेकिन नाजी ताकत के वर्चस्व से 1930 के दषक में यह जर्मनी में समाप्त हो गया।
फिर फ्रांस में इसी दशक से मार्क ब्लॉच, फेब्रे तथा फरनैंड ब्रॉडेल जैसे एन्नेल्स स्कूल के इतिहासकार - चिन्तकों ने अपने विश्‍वविख्यात कृतियों से उपयुक्‍त विचारों को परिपक्व किये और उसे विद्वद्जगत में प्रतिष्ठा दिलाये। साथ ही इंगलैंड में 1940 के दशक से उभरता हुआ ”सोशल हिस्टरी“ हॉब्सबॉम और ई. पी. टॉम्प्सन के बहुमूल्य प्रयास और कृतियों से 1970 तक आते-आते प्रतिष्ठित हुआ जो फ्रांस के एन्नेल्स स्कूल के अनुसार ही था। ई. पी. टॉम्प्सन के तिरूवनन्तपुरम में आयोजित 1976 के इन्डियन हिस्टरी कांग्रेस के अधिवेषन में दिये गये भाषण से भारत के इतिहासकार लोग भी बहुत ही प्रेरित हुए।7 यहाँ भी ”हिस्टरी फ्रॉम बिलो“, अर्थात् विभिन्‍न श्रेणी और पेशों के जन समुदायों (जिनका स्थान निम्न स्तर पर रहा और जिनका इतिहास लेखन में स्थान नहीं रहा) ऐसे विषाल जन-समूहों को इतिहास लेखन में स्थान देने की प्रवृति प्रारम्भ हुई।8 1980 के दशक से सबऑल्टर्न प्रोजेक्ट की षुरूआत हुई - आप सब जानते ही हैं।
इतिहास लेखन के समानान्तर समाजशास्त्र में भी उसके अनुकूल परिवर्तन होते रहे। 1960 के दशक तक तो मुख्य रूप से यह इतिहास से दूर नैचुरल साइन्षेज के मॉडेल उसकी शोध-प्रणाली, उसी के राह का अनुयायी बना रहा।9 लेकिन, कई प्रसिद्ध समाजशास्त्री इस दौर में भी ऐतिहासिक समाजशास्त्र की परम्परा कायम किये। सोरोकिन, बान्र्स और बेकर, जार्ज होमन्स, इत्यादि इस सन्दर्भ में प्रमुख रहे। विख्यात ऐतिहासिक समाजशास्त्री, चाल्र्स टिल्ली, समाजशास्त्र की इस परम्परा के विकास को तीन तरंगों में व्याख्या प्रस्तुत किये हैं। पहला तरंग तो उपर्युक्त विद्वानों के योगदान से प्रारम्भ हुआ।10 दूसरा तरंग 1970 के दसक से बहुत ही गम्भीर और व्यापक रूप से उभरा। आधुनिकीकरण, औद्योगीकरण के जो प्रोजेक्ट 18 वीं सदी के इनलाइटेन्मेन्ट के तहत प्रारम्भ हुआ था पूरे विश्‍व के लिये (पश्चिम के विचारकों की प्रेरणा से) उसके सारे स्वप्न, और वादे 20 वीं सदी के उतरार्ध तक आते-आते झूठे साबित हुए - विश्‍व का एक छोटा भाग धनी से और धनी होता गया, बाँकी बड़ा भाग गरीबी में डूबता गया - अन्डर डेवलपमेंट एक बड़ा प्रश्‍न बन गया, जिसके कारणों और स्वरूप के अध्ययन के लिये कई समाजशास्त्री ऐतिहासिक खोज की ओर मुड़े। मेक्रोहिस्टोरिकल सोशियोलोजी का विकास हुआ और इस क्रम में वैल्लरस्टाइन, माईकेल मान जैसे षास्त्रकारों का महत्‍वपूर्ण योगदान रहा। साथ ही समाजशास्त्र और इतिहास के बीच की दूरी दूर करनें की बात फिलिप एब्रम्स11(1980), चाल्र्स टिल्ली12(1980), ’सोशल हिस्टरी’ का उत्थान13 (गिडेन्स: 1981) बोर्डियो14 (1990), इत्यादि के प्रभाव से 1980 के दसक से जोर पकड़ती गई; जिसके फलस्वरूप तीसरे तरंग का उत्थान हुआ, हिस्टोरिकल सोशियोलोजी के जर्नल का प्रकाषन प्रारम्भ हुआ, हिस्टोरिकल सोशियोलोजी या सोशियोलौजिकल हिस्टरी को अमेरिका के विश्‍वविद्यालयों में प्रतिष्ठित स्थान दिया गया।15 आज, यह एक बहुत सशक्त बौद्धिक धारा के रूप में उभरता जा रहा है, जिसके तहत प्रधान तौर पर आज के समाज में अनेकता , उपेक्षित परम्पराएँ, उपेक्षित ज्ञान, सामाजिक और आर्थिक रूप से जो निम्न स्तर पर हैं उनकी स्थिति, अनुभव और सांस्कृतिक परम्परा, इत्यादि का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में षोध एवं अध्ययन करना ही उचित माना गया है।16 इस प्रसंग गुरूदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर के 1930 के दसक में कहे गये बातों का सहज स्मरण हो रहा है। शान्तिनिकेतन में एक विधवा अपनी कन्या का विवाह शास्त्रीय तरीके से करना चाहती थी। पंडितों ने विरोध किया कि नान्दी श्राद्ध विधवा नहीं कर सकती। गुरूदेव ने पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी से कहा कि हजारों वर्षों के हमारे इतिहास में यह पहली घटना तो नहीं ही होगी - ग्रन्थों का अवलोकन करें। पंडित जी सारे खोज किये और इसके पक्ष और विपक्ष में दिये प्राचीन आचार्यों के बचनों को गुरूदेव के समक्ष प्रस्तुत किये तथा साथ ही यह भी बताए कि विपक्ष के वचन ही समाज में मान्य रहे। गुरूदेव ने कहा कि क्या पक्ष में दिये वचनों के आचार्यगण हमारे लिये कम पूज्य हैं, क्या विपक्ष की ही परम्परा परम्परा है, पक्ष की परम्परा जिसकी उपेक्षा की गई वह भी तो हमारी ही परम्परा है - आज के प्रश्‍न जिस परम्परा से सार्थक है उसे इतिहास वोध में जगह होनी चाहिये।17 क्रोचे और आज के चिन्तन को गुरूदेव स्वतंत्र रूप से 70-75 वर्ष पहले कितनी सहज भाव से व्यक्त किये थे।
अभी तक जितना समय मैं ने लिया वह इसीलिये कि मैं आग्रह करना चाहता हूँ कि इन विषयों की ओर मिथिला की ऐतिहासिक धरातल पर ध्यान देने की चेष्टा की जाय। उपेक्षित वर्ग, उपेक्षित लोक (उच्च वर्ग के व्यक्ति भी उपेक्षित होते हैं जिनके योगदान जो आज के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं भुलाए जा चुके हैं या भुलाए जा रहे हैं), उपेक्षित विचार-धारा, परम्परा, इत्यादि जो आज के समाज के विषाल जन-समूह से सम्बन्धित है, इन सबका इतिहास, जिसे हम सामान्य जनों का इतिहास कह सकते हैं, तैयार हो सकता है। आप जानते हैं कि भारत के कई अन्य भू-भाग के तुलना में इस क्षेत्र पर शोध कम हुए हैं। आवश्‍यकता है कि शोध हो और वैसा शोध जो समाजशास्त्रीय और ऐतिहासिक सम्पूर्णता की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त शोध प्रणाली पर आधारित हो जिससे यहाँ के सोशल रियलिटी सही ज्ञान पैदा हो सके। मैं मानता हूँ कि आप इन बातों से अवगत हैं, इस ओर प्रायः प्रयासरत भी होंगे। लेकिन, इस ओर आपका ध्यान अधिक से अधिक जाय इस लिये मैनें कथित सारे शब्दों से आह्वान किया है।
अब मैं आपका ध्यान मिथिला में 14वीं-15वीं सदी और उसके बाद से उभरते सामाजिक-सांस्कृतिक एवं धार्मिक प्रवृतियों एवं उसके परिणामों की ओर ले जाना चाहता हूँ।
14वीं सदी की चण्डेश्‍वर ठाकुर कृत राजनीति रत्नाकर का 1936 ई. में बिहार एवं ओरिसा रिसर्च सोशाईटी द्वारा प्रकाशन हुआ, जिसके संपादक थे सर के.पी. जायसवाल। अपनें ”इन्ट्रोडशन“ में इन्होंने बहुत बातों का जिक्र किया। इनके अनुसार भारत में प्राचीन काल से चली आ रही ”अर्थशास्त्र“ और ”दण्डनीति“ की परम्परा 11वीं सदी तक समाप्त प्राय हो गई और धर्मशास्त्र का वर्चस्व बढ़ने लगा जिसके चलते राजतन्त्र सम्बन्धित विषयों का विवेचन भी अब धर्मशास्त्र के सिद्धान्तों के आधार पर ही प्रारम्भ हुआ।18 धीरे-धीरे मुस्लिम ताकतों का अभ्युदय होता गया, जिसके संक्रमण से प्रायः उस समय के बारे में, जायसवाल लिखते हैं: “…. Important are the norms which obtained at the close of the Hindu and the beginning of the Muhammadan periods. Originality and force are on the decline……..”.19 महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय समाज में ब्राह्मणीय/वैदिक वर्चस्व बढ़ रहा था, उदारवादी दृष्टिकोण जिससे समाज के विभिन्‍न सेकुलर गतिविधियों, विधाओं, और पेशाओं को बल मिलता वह क्षीण हो रहा था। अलबेरूनी 11वीं सदी में भारत आये थे; उन्होंने भी यह महसूस किया कि यहाँ की सामाजिक और राजनीतिक माहौल ऐसे हो गये हैं कि धर्मशास्त्रीय विद्याओं के अतिरिक्त सेकुलर विद्याएँ और धाराएँ न तो ठहर सकती हैं और न ही पनप सकती हैं।20 स्पष्ट है कि अलबेरूनी भी ब्राह्मणिक/वैदिक धारा के उभरते वर्चस्व और उसके संभावित परिणाम को अनदेखा नहीं कर सके। लेकिन, और क्या बातें हो रही थी उस कालखण्ड में इस प्रसंग, हमारे यहाँ के विश्‍वविख्यात इतिहासकार रामशरण शर्मा के अनुसार उच्च वर्णों (खासकर क्षत्रियों) से नीचे वर्णों के लोग भी विभिन्‍न क्षेत्रों में राजा/चीफ (प्रधान) बन रहे थे, जैसे जपला के ”खयरवाल“ शासक, पाल राजकुल, वर्धन राजकुल इत्यादि21। ऐसे राजाओं को समाज में अपने राजा-पद की औचित्य सिद्ध करने के लिये ब्राह्मणों का सहारा लेना पड़ा जो उनके लिये ऐसे (झूठे) कुर्सीनामें तैयार कर उन्हें प्राचीन काल के सूर्यवंशी या चन्दªवंशी प्रमाणित करते थे।22 बी.डी. चट्टोपाध्याय के अनुसार ऐसे राजे ब्राह्मणों के सहयोग पर निर्भर करने लगे जिसके बदले उन्हें काफी भू-सम्पति दान में प्राप्त होने लगा।23 एक दूसरे प्रख्यात इतिहासविद्, डेविड शूलमन, ब्राह्मणों के इस उभरते वर्चस्व की बात किये हैं।24 प्रायः यह क्रम बढ़ता ही गया और के.पी. जायसवाल के अनुसार, 14वीं सदी तक आते-आते चण्डेश्‍वर ने यह महसूस किया कि इस प्रवृति उभरने से जाति/वर्ण और पॉलिटी का शास्त्रीय सम्बन्ध वास्तविकता में मूलतः समाज में विच्छिन्न् हो चुका है; राज्याभिषेक की बात निरर्थक है और, प्रायः इसीलिये, एक तरह से क्रान्तिकारी व्यवस्था दिये कि राजा वही जो प्रजा की रक्षा करे, चाहे वह किसी भी जाति या वर्ण का हो।25 चण्डेश्‍वर ठाकुर अपने समय, 14वीं सदी के प्रख्यात विद्वान राजपुरूष थे। पी.वी.काणे के अनुसार मिथिला और बंगाल के क्षेत्रों में चण्डेश्‍वर के दिये गये विचार और व्यवस्था का बहुत ही व्यापक प्रभाव पड़ा।26 इसी लिये शायद, अब ब्राह्मणों द्वारा निर्मित झूठे कुर्सीनामों का कोई प्रयोजन नहीं रहा - ऐसे कुर्सीनामों के बनने का कोई उदाहरण बाद के दिनों में प्रकाश में नहीं आये हैं - जहाँ तक मुझे ज्ञात है। चण्डेश्‍वर की व्यवस्था ही किसी जाति/वर्ण के राजा को मान्यता प्रदान करती गई। बहुत विश्‍वासपूर्वक तो नहीं कह सकते, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि चण्डेश्‍वर की इस व्यवस्था के चलते बहुत सी जातियों (जिन्हें हम अभी निम्न या दलित वर्गों के मानते हैं) के लोग भी अलग-अलग इलाके में राजा या चीफ (प्रधान) बने, अपने शासन चलाए। 1883 ई. में (उर्दू में) प्रकाशित पुस्तक आईना-ए-तिरहुत में लेखक बिहारी लाल ‘फितरत‘ अपनें फील्ड सर्वे से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर निम्न लिखित गढ़ों के अवशेष का जिक्र करते हैं; मधुबनी जिला में परगना हाटी और परगना जरैल में राजा कठेश्‍वरी के गढ़ों के अवषेष राजा गन्ध की गढ़ी का अवषेष प. हाटी में; राजा भर की गढ़ी के अवशेष प. चखनी में; एवं परगना हावी में दुसाध राजा के गढ़ का खण्डहर।27 1933 ई. में प्रकाशित भागलपुर दर्पण (हिन्दी में) में लेखक झारखण्डी झा अपनें फील्ड सर्वे के दौरान प्राप्त सूचनाओं के आधार पर इस जिले में गंगा के उत्‍तर खासकर खेतौरी, कैवर्त और भर राजाओं/प्रधानों के दुर्गों, महलों और मन्दिरों के अवषेष का जिक्र करते हैं और मौखिक परम्परा की चर्चा करते हैं जिसके अनुसार खेतौरी राजाओं से पहले दक्षिण भागलपुर में नट और दुसाध राजाओं का षासन था।28 भर राजा के साथ खण्डवला राज संस्थापक म.म. महेश ठाकुर के बालक अच्चुत ठाकुर के (16वीं सदी में) संघर्ष एवं भर राज-परिवार के उन्मूलन के प्रसंग म.म. परमेश्‍वर झा लिखित मिथिला तत्‍व विमर्ष में एक विवरण है।29 मिथिला के इतिहासकारों के लिये यह एक आवश्‍यक विषय है कि ऐसे राजाओं/प्रधानों के षासन की उत्पत्ति, उसकी व्यवस्था, उसकी प्रतिष्ठा, समाज के विभिन्न् वर्गों के बीच सम्बन्ध, उत्पादन, पेशाओं, इत्यादि के प्रसंग विस्तार से शोध करें। मैं यहाँ मात्र इसे समाज में 13वीं-14वीं-15वीं सदी में उभरते उदारवाद की प्रवृति के प्रमुख उदाहरण के रूप में विवेचना कर रहा हूँ। पहले जो जाति-वर्ण आधारित राजा होने की, याने, राजसत्‍ता की परम्परा थी उससे राजनीतिक क्षेत्र को किसी न किसी हद तक स्वतंत्रता मिली।
फिर 14वीं-15वीं सदी में विद्यापति प्रेम के (राधा-कृष्ण के प्रेम के) गीत गाये, मैथिली में यह स्थापित करते हुए कि देसिल बयना सब जन मिठठा। ”देसिल बयना“ में बहुत पहले से ही रचनाएँ हो रही थी, जैसे पाली में बौद्ध ग्रन्थों की रचना हो चुकी थी, ज्ञानेश्‍वरी की रचना मराठी में हो चुकी थी। लेकिन, कभी, किसी ने ”सब जन मिठठा“ की सैद्धान्तिक गुणवत्‍ता जाहिर नहीं की थी - प्रायः सोशियो-लिंग्विस्टिक्स की यह प्रथम अवधारणा देने बाले विद्यापति थे, जिन्होनें ”सब जन“ के रूचि की बात किये - उसे सिद्धान्त के रूप में स्थापित किये, ”सब जन“ को, लोक को, साहित्य की परिधि मे लाये। विद्यापति लोक पक्ष की ओर झुके थे। इनसे पूर्व 14वीं सदी के पूर्वार्ध में ज्योतिरीश्‍वर ठाकुर द्वारा वर्णरत्नाकर की रचना हो चुकी थी - मैथिली गद्य में, जिसका महत्‍व इतिहास, समाजशास्त्र और मानव विज्ञान के लिये बहुत ही विषिष्ट है - सोशल सर्वे की यह प्रथम कृति है पूरे भारत में (इस प्रसंग मैं अन्यत्र विवेचना कर चुका हूँ।) मिथिला में भी अन्य (कुछ) क्षेत्रों की तरह लोक भाषा/बोली बुद्धिजीवियों के चिन्तन का माध्यम प्रायः सशक्त रूप से बन चुका था। इसके चलते शायद लोक भाषा/बोली और देव या बौद्धिक चिन्तन की भाषा संस्कृत के पक्षधरों के बीच द्वन्द्व शुरू हुआ। नामवर सिंह, पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, इरफान हबीब, तथा जॉन इरविन के 1946 ई. के लेख ”द क्लास स्ट्रगल इन इंडियन हिस्टरी एण्ड कल्चर“ (द माडर्न क्वाटर्ली, जिल्द 1, सं. 2, लंदन) के आधार पर मानते हैं कि मध्य युग में ब्राह्मणिक/वैदिक और लोक मत की बीच संघर्ष या द्वन्द्व बहुत प्रखर हो गया।30 पुराणों में वर्णित ब्राह्मण और शूदª के लंबे संघर्ष, जिसके बारे में रामशरण शर्मा अपने एक लेख (”द कलि एज, ए पिरियड ऑफ सोशल क्राइसिस“, अर्ली मेडिएवल इंडियन सोशाईटी, कोलकाताः ओरियन्ट लाँगमैन, 2001, पृ. 51) में उल्लेख किये हैं, शायद इस द्वन्द्व को तीब्रता प्रदान किये होंगे। इसी संघर्ष के दौरान संस्कृत विरोधी स्वर (ज्ञानेश्‍वरी की रचना प्रसंग महाराष्ट्र में) और भाषा विरोधी स्वर (तुलसीदास के भाषा में लिखे रामायण प्रसंग जो मूलतः मौखिक परम्परा में है) उभरे। ऐसे स्वरों में किसी भाषा या विद्या के विरोध की बात नहीं की जा सकती - बात थी भाषा या विद्या के किसी एक वर्ग में सीमित रहने से उस आधार पर उस वर्ग का समाज में अपने हित में वर्चस्व बनाये रखने के प्रयास और उस वर्चस्व का दूसरे वर्ग द्वारा विरोध/संघर्ष। इस संघर्ष को कहा गया कहीं संस्कृत विरोधी और कहीं भाषा विरोधी - लेकिन उसका अर्थ ऐसे वाक्यों से नहीं बल्कि उसमें निहित संदर्भ (वर्चस्व की राजनीति) से सही होता है। वाक्य और उसके सही अर्थ निरूपण के प्रसंग विद्यापति अपने पुरूष परीक्षा में (”शास्त्रविद्य कथा“ में) बहुत सहज रूप से स्पष्ट किये हैं।31 यह संघर्ष नौलेज और पावर के संबन्ध के तहत था। नौलेज और पावर के संबन्धों का इतिहास हमारे यहाँ अपर्याप्त है जिस पर षोध अपेक्षित है और जिससे इस प्रसंग द्वन्द्वों और संघर्षों की सही विवेचना हो सकती है। नामवर सिंह जिसे लोकमत कहते हैं वह लोकायत है। इसकी परम्परा वैदिक युग से घटती-बढ़ती रही, जिसे देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय और अन्य कई विद्वान वैदिक परम्परा के समानान्तर मानते हैं, जिसमें जाति-वर्ण विचार का कोई स्थान नहीं रहा, स्त्री-पुरूष के भेद भी नहीं रहे, सारे तंत्र परम्पराएँ एवं अन्य, (खासकर जाति-वर्ण व्यवस्था के विरूद्ध) जितने सेक्ट्स और कल्ट्स थे, सब प्रायः इसी लोकायत परम्परा के तहत आते हैं।32 तंत्र मार्गों का विकास विशाल जन-समूह के बीच फैल रहा था और बुद्धिज्म भी उसमें प्रवेश पाकर जन-समुदायों में पहुँच गया और फिर नाथ सम्प्रदाय के 8वीं-9वीं सदी से जो विकास हुआ उसमें 14वीं सदी के पहले तक करीब 125 सिद्धों के नाम मिलते हैं जिनमें कई महिलाएँ हैं जो खासकर जिन्हें हम आज दलित समूह मानते हैं उसी जाति समूह के (द्विवेदी, हजारी प्रसाद, 1918 नाथ सम्प्रदाय, हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली पौ.6, नई दिल्ली: राजकमल: 48), तीसरी-चैथी सदी (ई.पू.) में जब उच्च वर्ण के महिलाओं को भी वैदिक परम्परा में भागीदारी से हटा दिया गया तो वे भी कालक्रम से तांत्रिक परम्पराओं को अपनाते गये। 14वीं-15वीं सदी तक आते-आते विभिन्न् धार्मिक मतों का संघर्ष (जो हिंसा पूर्ण नहीं थे) बहुत प्रखर हो गया। साथ ही, 13वीं-14वीं सदी तक सब लोग अपनें को ”हिन्दू“ कहने लगे, ‘हिन्दू‘ अस्मिता अपनाये, और पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार पहली बार विभिन्न् धार्मिक मतों के मानने बाले (बुद्धिज्म, जैनिज्म और इस्लाम को छोड़कर) एक कॉमन ‘हिन्दू‘ अस्मिता से बन्ध गये - इतना बड़ा जन समूह का आधार उससे पहले किसी एक, वैदिक या लोकायत परम्परा को भी नहीं मिला था।33 हिन्दुइज्म के आविर्भाव प्रसंग मैं ने अन्यत्र विस्तार से विवेचना किया है,34 इसलिये यहाँ ज्यादे समय नहीं लूंगा। सिर्फ इतना व्यक्त करना आवश्‍यक है कि विद्यापति (हिन्दू) धर्म की व्याख्या जाति-वर्ण से ऊपर उठकर किये और उस व्यक्ति परक किये-हर व्यक्ति अपने कुल की परम्परा का निर्वाह यथा साध्य करे और समाज में साधारण धर्म अर्थात् हिंसा न करे, किसी के धन और स्त्री से कोई मतलब न रखे।
विद्यापति के बाद नानक, कबीर, चैतन्य, सब सिद्धान्ततः इसी भावना के अनुसार वर्ण-जाति के विरूद्ध विचारों के प्रसार के लिये जाने जाते रहे हैं। उदारवादी प्रवृतियों को इस तरह बल मिलता रहा जो उच्च वर्णों के अतिरिक्त विशाल जन समूह में फैलता गया।
मिथिला में कबीर पन्थ के इतिहास का गहन अध्ययन पुर्णेन्दु रंजन ने किया है और इन्होंने दिखलाया है कि कैसे 17वीं सदी से इस पन्थ को उच्च वर्णों को छोड़कर अन्य निम्न और दलित वर्गों के जन समूह अपने विचार धारा के रूप में स्वीकार करता गया।35 फ्रान्सिस बुकानन के पुर्णियाँ और भागलपुर के रिपोर्ट्स (19वीं सदी के आरम्भ काल) में कबीर पन्थ, नानक शाही, इत्यादि के माननें वालों की विषाल जनसंख्या (निम्न वर्गों की) का विवरण मिलता है। 19वीं सदी के उतरार्ध में रियाज-ए-तिरहुत (1867) और आईना-ए-तिरहुत (1883) के मोताबिक दरभंगा शहर में प्रसिद्ध नानक शाही मठ था। अन्य कई स्थलों पर भी इनके मठ थे। ये जन समूह गाँवों में अपने मुसलमान पड़ोसियों के साथ हिल-मिलकर रहते थे, सब, सबों के त्यौहार में भाग लेते थे। महिलाओं के बीच, उच्च वर्ण की महिलाएँ भी लोकायत के तहत विभिन्न् तंत्र परम्पराओं को सदियों से अन्य वर्णों/जातियों के महिलाओं साथ एक कॉमन आईडियोलोजी का निर्वाह करती रही, जिसके चलते उनके बीच आपस में ज्यादे जातिगत भेद-भाव नहीं रहे। आज भी अगर आप किसी उच्च वर्ण के घर के भीतर जाय तो देख सकते हैं कि उनके घर की महिलाएँ अन्य महिलाओं के साथ एक ही स्थान पर बिना किसी विशेष दूरी के अन्तरंग बातें करती हैं। 19वीं सदी के अन्तिम दशक में प्रकाशित यही दरभंगा के भुवनेश्‍वर मिश्र लिखित बलवन्त भूमिहार पढ़ने से यह और भी स्पष्ट हो जाता है। महिलाओं में विभिन्न् तांत्रिक परम्परा का ज्ञान पुश्‍त-दर-पुश्‍त मौखिक परम्परा पर आधारित रहा, तांत्रिक यंत्रों पर आधारित ‘अरिपन‘ का ज्ञान भी उन्हीं के बीच रहा-उसी से ज्यादा प्रभावित मिथिला पेंटिंग का सृजन महिलाओं तक ही सीमित था - पुरूष वर्ग में इस प्रसंग कोई ज्ञान नहीं था - अब तो बाजार बढ़नें से सभी इस ओर आकर्षित हैं। बहुत सारे लोकगीत महिलाओं के बीच ही रहे जिसे सभी वर्ण की महिलाएँ साथ-साथ विभिन्न् अवसरों पर गाते रहे।
तात्पर्य यह है कि उदारवादी विचार लोकायत के अन्तर्गत विषाल जन समूह जो मुख्यतः निम्न वर्णों और दलित जाति समूह के थे उनके बीच बहुत हद तक फलता-फूलता गया। इस प्रसंग बहुत छानबीन और खोज की आवश्‍यकता है निश्चित तौर पर कुछ कहने की; फिर भी मैंने यथा साध्य इस प्रसंग जो ट्रेन्ड्स दृष्टिगोचर रहे हैं, उनका उल्लेख किया है। इसके विपरीत, मिथिला में खासकर, उच्च वर्णों में, विशेषकर ब्राह्मणों में, संकीर्ण भावना पनपती रही।
पहले मैं जिक्र कर चुका हूँ कि के.पी. जायसवाल के अनुसार 11वीं सदी के बाद से धर्मशास्त्रीय पक्ष प्रबल होता गया। बुद्धिजीवी वर्ग जो वैदिक परम्परा के मुख्य पक्षधर थे, उन्होंने 13वीं-14वीं सदी तक विद्याओं को ऊध्र्वाधर वर्गीकरण कर दिया। समस्तरीय वर्गीकरण तो प्राचीन काल से चला आ रहा था, लेकिन उसमें किसी का मुख्य या गौण होने की बात नहीं थी। भारतीय परम्परा में विद्याओं के वर्टीकल वर्गीकरण के उभरने के कारण, कन्डीशन्स और परिणाम के प्रसंग मैं ने अन्यत्र अपने एक लेख (भरतीय परम्परा में ज्ञान का मूल्य अनुक्रमश्, आलोचना अंक - 39, अक्टूवर-दिसम्बर 2010: 40-44 ) में विचार किया है। यहाँ सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि कृषि एवं अन्य सेकुलर वृतियों की विद्याओं को गौण स्थान दिया गया और धर्मशास्त्र से संबन्धित विद्याओं को बहुत ही प्रमुख माना गया। म.म. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी मध्य युग के एक प्रचलित संस्कृत कहाबत का जिक्र करते हैं; ”शस्त्रेषु नष्टाः कवयो भवन्ति, काव्येषु नष्टाष्च पुराण पथाः, तत्रापि नष्टाः कृषिमाश्रयन्ते; नष्टाः कृष्टेर्भागवत भवन्ति“; अर्थात्, शास्त्रों (न्याय, धर्मशास्त्र, इत्यादि) का अध्ययन सर्वोपरि था, इससे गौण था काव्य शास्त्र, जिससे गौण था पुराण-प्रवचन; जो यह भी नहीं कर सकते उनके लिये था कृषि कार्य; और, जो कुछ भी नहीं कर सकते वे साधू भेष धारण कर घूमते थे।36 ध्यान देने की बात है कि कृषि पर ही पूरा समाज टिका था - बुद्धिजीवी वर्ग भी उसी पर अपने जीवन निर्वाह करते थे, परन्तु इस विद्या को ही गौण बना दिया गया। मेरा अनुमान है कि समाज इस तरह अन्दर से कमजोर होता गया - उत्पादन पर असर पड़ा होगा; उत्पादन से जुड़े वर्गों के सम्बन्ध भी प्रभावित हुए होंगे। प्राचीन काल में ऐसी बात नहीं थी - सभी वर्ग के लोग कृषि कार्य में भाग लेते थे - जनक के हल चलाने (सीता जन्म प्रसंग) का जो लिजेन्ड है वह ऐतिहासिक दृष्टि से सत्यता की झलक देता है; कृषि विद्या का स्थान अन्य विद्याओं के समान ही था। मगर मध्य युग आते-आते ब्राह्मणों ने हल छूना भी पाप मान लिया - कृषि विद्या उपेक्षित हो गई। कृषि पराशर (प्रायः दसवीं सदी) के बाद कोई पुस्तक नहीं लिखी गई। एक पोथी उपवन विनोद (संस्कृत में) का प्रकाषन कामेश्‍वर सिंह द. संस्कृत विश्‍वविद्यालय द्वारा 1984 ई. में हुई, लेकिन इसके लेखक और उनके काल के विषय में कोई सूचना नहीं है।
शास्त्रों में भी जो महत्वपूर्ण माने गये उनमें न्याय या नव्यन्याय का स्थान सर्वोपरि हो गया। के.पी. जायसवाल के अनुसार, पहले कहा गया, (कि) मौलिक चिन्तन का ह्रास 11वीं-12वीं सदी से प्रारम्भ हो चुका था - मिथिला में यह कुछ देर से हुआ। भारतीय दर्शन की अन्तिम मौलिक कृति तत्‍व चिन्तामणि, दिनेष चन्दª भट्टाचार्य के अनुसार 14वीं सदी के गंगेश उपाध्याय का है - जिससे कालक्रम में मिथिला ही नहीं, पूरा देश का बौद्धिक जगत आन्दोलित हो गया। लेकिन, उसके बाद टीकाकारों का युग आया - पांडित्यपूर्ण टीके लिखे गये। भट्टाचार्य के अनुसार गुरू-शिष्य के बीच लिखित बाद-विवाद की परम्परा प्रारम्भ हुई जिससे बहुत ही महत्वपूर्ण, स्वस्थ और ऐक्टिव इन्टेलेक्चुअल माहौल का सृजन हुआ, लेकिन, 17वीं सदी तक आते-आते यह परम्परा विलीन हो गई जिससे मिथिला की बौद्धिक गरिमा करीब-करीब समाप्त ही हो गई।37 बाद में ऐसे पंडितों की संख्या घटती ही गई। म.म. गंगानाथ झा के अनुसार 19वीं सदी के अन्त तक आते-आते जिस मिथिला में पहले कभी 100 मीमांसक थे अब मात्र तीन ही बच गये थे।38 शेल्डन पोलक संस्कृत साहित्य के इतिहास का अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के विद्वान हैं, इनके अनुसार 17वीं सदी के पंडितराज जगन्नाथ के बाद साहित्यिक चिन्तन (संस्कृत में खासकर) पूरे भारत में बहुत ही शिथिल हो गया।39 मैं इस प्रसंग ज्यादे समय नहीं लूंगा। आप अन्य विद्याओं के इतिहास की ओर झाँकेंगे तो यही पायेंगे कि मौलिक चिन्तन क्रिया मन्द होती गई सभी शास्त्रों में - बौद्धिक जगत ह्रास की ओर बढ़ता गया। संकीर्ण भावना के उदय होने से समाज में चली आ रही बौद्धिक परम्परा भी 14वीं-15वीं सदी के बाद क्रमषः कमजोर (ह्रासोन्मुख) होती गई।
अब, जरा समाज की ओर देखें। रमानाथ झा अपने द्वारा संपादित पुरूष-परीक्षा के इन्ट्रोडशन में लिखते हैं कि इस्लाम के अनुयायियों के आक्रमण एवं प्रभुता को देखते हुए अपने पारंपरिक स्वत्‍व और एक्झिस्टेंस को अक्षुण रखने हेतु मिथिला के 13वीं-14वीं सदी के पंडित वर्ग जन्म, संस्कार, विद्या, आदि को ध्यान में रख कर निबन्धों की रचना करने लगे।40 जन्म शुद्धता जाति शुद्धता पर आधारित थी - इसलिये 14वीं सदी के प्रारंभिक काल में वंशावलियों के पंजी प्रबन्ध का आयोजन हुआ। मैं यहाँ पंजी प्रबन्ध का विशेष विवरण नहीं दे सकता - मात्र इससे प्रभावित सामाजिक ट्रेन्ड्स की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। रमानाथ झा प्रायः मेरी दृष्टि से पहले और अन्तिम आधुनिक विद्वान थे जो करीब 15 वर्षों तक प्रख्यात पंजीकार मोदानन्द झा से पंजी पुस्तकों का, पंजी के भाषा का अध्ययन किये, और जिन्हें पंजीकारों द्वारा मान्यता भी मिली। पंजी प्रसंग इन्हीं के लेखों के आधार पर यहाँ कुछ बातें कह रहा हूँ।
इस प्रसंग पहली बात तो यह प्रतीत होता है कि जिस मिथिला में पहले विद्या और व्यक्तित्व ही सबसे बड़ा मूल्य था, 14वीं-15वीं सदी के बाद धीरे-धीरे जाति भी उसके साथ जुड़ती गई, यों कहिये कि हावी होती गई। गंगेश, वर्धमान, अयाची, इत्यादि के परिचय में उस समय के लेखों में मैथिल अस्मिता का उल्लेख तो है, लेकिन मैथिल ब्राह्मण के अन्दर की जाति-भावना की बात नहीं है। लेकिन 17वीं सदी से प्रारम्भ होते-होते 18वीं सदी तक आकर मैथिल ब्राह्मणों के अन्तर्गत श्रोत्रिय, योग्य, पंजीवद्ध एवं जयवार वर्गों का वर्टिकल वर्गीकरण सुनिश्चित हो गया।41 श्रोत्रिय पहले भी थे, लेकिन वे व्यक्ति विशेष हुआ करते थे - कोई जाति या वर्ग नहीं, अब जातीय आधार पर भेद-भाव, जैसे, विवाह, खान-पान, इत्यादि में बढ़ने लगा। जाति से विशुद्धता की डिग्री जुड़ी थी (धर्मशास्त्रीय आधार पर) और धीरे-धीरे मिथिला या मैथिल होने की अस्मिता का पंजी ही मुख्य स्तम्भ या आधार हो गया - रमानाथ झा के अनुसार।42 चूँकि मिथिला के कर्ण कायस्थों में भी पंजी व्यवस्था प्रारम्भ से रही इसलिये उन्हें भी मैथिल अस्मिता में जगह मिली, अन्य सभी वर्ग इस आइडिन्टिटी से वंचित हो गये। पंजी व्यवस्था से कर्ण कायस्थ समाज भी 8 श्रेणियों में बँट गये।43 इस तरह ब्राह्मणों और कायस्थों के समाजों का भीतर से ख्ण्ड-पखण्ड हो गया - सामुहिक कम्युनिटी की भावना षिथिल होती गई - अपने-अपने श्रेणी की महत्‍व, अहंकार ही सर्वोपरि हो गया। मिथिला की प्राचीन काल से चली आ रही सारी सांस्कृतिक-बौद्धिक पूंजी इसके समक्ष मानो नतमस्तक हो गई। यहाँ यह कहना आवश्‍यक है कि पंजी-पुस्तकों का महत्व मिथिला के इतिहास के लिये बहुत ही महत्‍वपूर्ण है, उसमे दिये गये व्यौरे हमारे लिये असन्दिग्ध मूल्य के श्रोत हैं। मैं तो सिर्फ उसका जैसा उपयोग या दुरूपयोग हुआ, उसी का कुछ विवरण दिया है। समाज में इन्टर पर्सनल और इन्टर ग्रुप इन्टरऐक्षन्स में धार्मिक विशुद्धता के आधार पर विभिन्न् वर्टिकल श्रेणियों का प्रभाव तो प्रायः अवश्‍य ही पड़ा - जिसके साक्ष्य विभिन्न् उपन्यासों एवं कथाओं में भी मिल सकता है। बिकौआ जैसी वीभत्स प्रथा 19वीं सदी में किस तरह जाति, कुल, श्रेणी के मर्यादित मूल्यों से फली-फूली सब जानते हैं। क्षणिक स्वार्थ पूर्ति, बिना उद्यम किये सुखों की आकांक्षा, कुल और श्रेणी को ही (विद्या और व्यक्तित्व नहीं रहनें पर भी) बड़प्पन का आयाम मानना, पाखंड का बोलबाला, इत्यादि, आप उस समय के प्रचलित षब्दों, कहाबतों में ढूँढ़ सकते हैं।
इतना ही नहीं - भौगोलिक क्षेत्रों की भी वर्टिकल श्रेणियाँ हो गई। पंचकोसी की अवधारणा आ गई। 1915 ई. में रास बिहारी लाल दास अपनी पुस्तक मिथिला दर्पण में इस प्रसंग लिखते हैं कि अब ”केवल दरभंगा जिला ही मिथिला का बोधक हैं, उसमें भी मधुबनी सबडिविजनान्तर्गत थाना मधुबनी, खजौली तथा बेनीपट्टी ही मिथिला का परिचय विशेष रूप से देते हैं, इस समय मिथिला का केन्दª मधुबनी माना जाता है“।44 अन्य सभी इलाके गौण हो गये, प्रायः भदेस माने जाने लगे।
जो लोग गंगा नदी के तरफ बसे वे दछिनाहा कहे जाने लगे। इस प्रसंग उल्लेखनीय है कि 1972 ई. में प्रकाशित बड़हिया गाँव (गंगा के दक्षिण तट स्थित) का ऐतिहासिक अध्ययन, मेरा गाँव, मेरे लोग के लेखक विश्‍वनाथ सिंह पृ. 21 पर लिखते हैं कि बड़हिया के पुरानें भूमिहार ब्राह्मण परिवार सब दिघवै मूल के शांडिल्य गोत्रीय मैथिल ब्राह्मणों के सन्तान हैं। हाल में बिहट (बरौनी) के चन्दª प्रकाष नारायण सिंह का संस्मरण (घर-आंगन और गाँव, पटना, ए. एम. एस. पब्लिकेशन्स) 2010 में प्रकाश में आया। इसमें उन्होंने अपनी वंशावली दिया है (पृ.186-पृ.208), जिसके अनुसार ये वत्स गोत्रके जलैवार मूल के हैं, इनके पूर्वज राको ठाकुर 16वीं-17वीं सदी में जाले से आकर गंगा के निकट बस गये। इसी तरह से बेलौंचे और अन्य मूल के मैथिल ब्राह्मण परिवार इस तरफ बसते गये - जिनमें बहुत तो भूमिहार ब्राह्मण की अस्मिता ले लिये और जो रह गये - मुंगेर, भागलपुर तक वे ”दछिनाहा“ याने निम्न श्रेणी के मैथिल ब्राह्मण माने जाने लगे। इतिहासकारों के लिये यह एक चुनौती है कि वे अस्मिता के बदलनें की परिक्रिया, कारण और कन्डीशन्स का शोध करें - कैसे मैथिल ब्राह्मण के कुछ परिवार भूमिहार ब्राह्मण बन गये।
मुख्य रूप से इस विवेचना द्वारा मैं यही मानता हूँ कि मिथिला में 14वीं-15वीं सदी के बाद उच्च जातियों - खासकर ब्राह्मण वर्ग में संकीर्णता की भावना बढ़ती रही जिसके फलस्वरूप यह वर्ग जो बहुत ही महत्‍वपूर्ण वर्ग रहा - ह्रासोन्मुख होता गया। मौलिक चिन्तन षिथिल होती गई, अन्दर से खण्ड-पखण्ड होता गया, जातीय विषुद्धता, क्षेत्रीय विशुद्धता सांस्कृतिक एवं बौद्धिक विरासत और चेतना पर हावी होती गई, क्रियेटिव पोटेन्शियल बहुत ही कमजोर होता गया।
इसके विपरीत समाज के अन्य निम्न वर्गों में उदारवादी विचार धारा का प्रभाव बढ़ता गया - ज्यादे से ज्यादे लोग इस ओर झुकते गये -मिथिला का समाज इन दो विपरीत धाराओं से ग्रसित हो गया, जिसके चलते एलिट और मासेज में विरोधात्मक संबन्ध बनते गये। अन्यत्र, मैंने अपने लेख ”एलिट-मास कन्ट्रैडिशन इन मिथिला इन हिस्टोरिकल पर्सपेक्टिव“ (सच्चिदानन्द एवं लाल, ए.के. सं.1980 एलिट एण्ड डेवलपमेंट, नई दिल्ली; कन्‍शेप्ट पब्लिशिंग कम्पनी, 187-206) में इन संबन्धों के बारे में लिखा है। परन्तु, ये सारी बातें खास प्रवृतियों के बारे में इशारा करते हैं। काल खण्ड (14वीं-15वीं सदी और उसके बाद) काफी लम्बा है; सामग्रियाँ छितरी हुई हैं - आवश्‍यकता है कि गम्भीर रूप से बहुत से इतिहासकार समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से इन्टेन्सिवली शोध करें और अपने अध्ययन से सुनिश्चित तथ्यों को प्रकाश में लावें।
आप के मन में यह प्रश्‍न उठ रहा होगा कि क्या मिथिला के इतिहास में विकास के कोई लक्षण 14वीं-15वीं सदी के बाद नहीं हैं, ऐसी बात नहीं है - ह्रास कितना भी तीब्र हो विकास किसी न किसी डिग्री में समाज के किसी न किसी सेक्टर में कुछ तो होगा ही। प्रश्‍न उठता है कौन से ट्रेन्ड (ह्रास का या विकास का) ज्यादे मुखर या सशक्त एवं दृष्टिगोचर रहा है, दूसरी बात है कि हम किसे विकास कहते हैं और किसे ह्रास, विकास प्रसंग बहुत विद्वान (दुनियाँ भर के) चिन्तन में लगे हैं - उनकी बातें आप तक पहुँच रही है। ह्रास की प्रवृति को मैंने संकुचित होने की प्रवृति मानता हूँ जो उदारवादी दृष्टि के विपरीत है। संकुचित होनें की प्रवृति से मानववादी मूल्यों की उपेक्षा होती है, छुदª स्वार्थ पूर्ति की मानसिकता प्रबल होती है, अल्पकालिक सोच (दूरगामी दृष्टि के विपरीत) प्रभावकारी हो जाता है, अपनें वर्ग/जाति की सीमा ही चिन्तन का क्षितिज रह जाता है, इत्यादि। फिर, आप सोच सकते हैं कि आज जब विकास की बातें हो रही हैं, विकास के मन्त्रों की तलाश हो रही है, तब क्या उचित है कि इतिहासकार वर्ग ह्रास पर शोध करें - इसी प्रसंग अपनी सारी शक्ति लगा दें, प्रश्‍न बहुत ही उचित है - इसमें कोई सन्देह नहीं। लेकिन, इस प्रसंग मैं उल्लेख करना चाहता हूँ जेनेट अबू-लुगहोड जैसे इतिहासकार के विचार। वैल्लस्र्टाइन ने 1974 ई. से वल्र्ड सिस्टम के विकास के प्रसंग अपना प्रोजेक्ट शुरू किये। इनके अध्ययनों से आप पूर्व परिचित हैं। इनके अतिरिक्त, वल्र्ड सिस्टम पर जेनेट अबू-लुगहोड की 1989 ई. में बिफोर यूरोपियन हेजिमोनी, द वल्र्ड सिस्टम ए.डी. 1250-1350, (ऑक्सफोर्ड यु. प्रेस, न्यूयोर्क) प्रकाशित हुई, जिसमें उन्होंने मध्य युग में वल्र्ड सिस्टम ट्रेडिंग जोन जो चीन से शुरू होकर इंडोनेशिया, भारत, अरब वल्र्ड से होते हुए यूरोपियन क्षेत्र तक फैली थी के इतिहास की विवेचना किये। इस अध्ययन के दौरान वे एक बहुत ही महत्वपूर्ण इस्सू उठाये कि पश्चिम के विकास क्रम पर शोध करने से ज्यादा महत्‍वपूर्ण और उपयुक्त है पूर्व के ह्रास पर शोध करना। रैन्डल कॉलिन्स जैसे समाजशास्त्री भी इसे अहम मानते हैं।45 विकास के लिये स्ट्रैटजी का चिंतन तब तक उचित एवं प्रभावकारी नहीं हो सकते जब तक हम ह्रास के लक्षणों, प्रवृतियों, समाज में उसके उत्पत्ति और प्रभाव के कारणों को नहीं जान लेते हैं। ह्रासोन्मुखी प्रवृतियों पर बिना काबू पाये बिना विकास की सारी योजना निरर्थक हो जाती हैं। मैं याद दिला दूं कि 1950 के दशक में किन स्वप्नों के साथ कम्यूनिटी डेवलपमेंट प्रोजेक्ट प्रारम्भ हुए थे। लेकिन आप सब जानते हैं कि 20 वर्षों के अन्दर ही उसका क्या हश्र हुआ। ह्रासोन्मुखी प्रवृति पर काबू पाने के लिये उन्हें जानना होगा, विश्‍लेषण करना होगा, उसके जड़ों तक पहुँचना होगा - और यह काम सिर्फ इतिहासकार कर सकते हैं। मेरी दृष्टि से यह बहुत ही उचित और तर्क संगत है। मैं मानता हूँ कि आपके ह्रास प्रसंग शोध से ही विकास यात्रा को सही दिषा मिलेगी।




पद टिप्पणियाँ
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’’’’’’’’’’’’’लेखक पटना विश्‍वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के अवकाश प्राप्‍त प्रोफेसर हैं।

Friday, April 8, 2011

यही है बिहार में बनी पहली रंगीन फिल्‍म

यह फिल्‍म 1941 की है, इसमे दरभंगा के महाराजा कामेश्‍वर सिंह और राजस्‍थान के महाराजा सवाई मानसिंह को देख सकते है, इसमें दरभंगा की शान के साथ पोलो मैदान को भी देखा जा सकता है, जो किसी खेल के लायक मैदान नहीं रहा, दरभंगा के इतिहास को देखने के लिए यह एक अमूल्‍य फिल्‍म है जो लंदन के कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में एक अनाम और अज्ञात दस्‍तावेज के रूप में रखी हुई है, मैं यह फिल्‍म तेजकर झा के सहयोग से मैथिली का पहला इपेपर इसमाद डाट काम से साभार ले कर यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं - आशीष

Thursday, November 25, 2010

क्या भारत का कारोबारी जगत अपनाएगा बिहार मॉडल

सतेंद्र
२४ नवंबर २०१० को मेरी शादी के ५ साल पूरे हो गए। मन में पहले से था कि इस दिन कार्यालय के काम से छुट्टी लेकर जीवन का आनंद लिया जाए। बाधा यह पड़ गई कि सुबह से ही मैं टेलीविजन पर भिड़ गया बिहार का चुनाव देखने। पत्नी ने उसमें कोई खास सहयोग नहीं दिया, लेकिन परिणाम देखने में बहुत अच्छा लग रहा था, इसलिए रात तक टीवी पर यही खबर देखता रहा।

बिहार में हालत यह हो गई है कि विपक्ष ही नहीं रहा। सारी सीटें नीतीश-मोदी ने हथिया ली। लालू प्रसाद जैसे करिश्माई नेता को यह उम्मीद तो कतई नहीं थी, या कहें कि किसी को यह उम्मीद नहीं थी।
नीतीश कुमार ने जनता से सिर्फ एक बात कही थी कि ५ साल से जो सेवा की है, उसकी मजदूरी दे दो। बिहार में ज्यादातर मजदूर ही हैं... खासकर वे लोग, जो वोट देते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि उन्होंने नीतीश को उनकी मजदूरी देकर खुश कर दिया। कारोबारी जगत भी खुश है। बिहार के चुनाव को एक मॉडल के रूप में देखा जा रहा है। जिस बिहार को कहा जाता था कि यह नहीं सुधर सकता, जाति-पाति से ऊपर नहीं उठ सकता, उसने कम से कम मजदूरी देने में तो पूरी दरियादिली दिखाई और सही कहें तो बिहार में नीतीश सरकार ने जितना काम किया था, उससे कहीं ज्यादा उन्हें मजदूरी मिली।

देश में अभी तक जाति की ही राजनीति चली है। कांग्रेस सरकार शुरू से कथित ऊंची जाति, दलित और मुसलमान के जातीय समीकरण से सत्ता में बनी रही। उसके बाद लालू प्रसाद के समय में वह वर्ग उभरकर सामने आया, जो कांग्रेस सरकार में सत्ता सुख से वंचित था और ऐसा हर राज्य में कमोबेश हुआ। कांग्रेस-भाजपा अभी भी उस वर्ग को अछूत मानती है, जिसका वोट लेकर मुलायम-लालू जैसे नेता सरकार में आए।

अभी भी उदाहरण सामने है। महाराष्ट्र में चव्हाण के बदले चव्हाण खोजा गया। कर्नाटक में भाजपा लिंगायत के बदले लिंगायत खोज रही थी, लेकिन येदियुरप्पा ने इस्तीफा ही नहीं दिया। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस ने रेड्डी के बदले रेड्डी खोज निकाला। ऐसे माहौल में अगर नीतीश कुमार २४३ में से २०६ सीटें जीतकर सत्ता में आते हैं तो निश्चित रूप से बिहार ने देश को एक नई दिशा दी है। यह प्रचंड बहुमत किसी जाति समूह के मत से नहीं मिल सकता, सबका मत नीतीश सरकार को मिला। वह भी मजदूरी के बदले।

मजदूरों से भरे बिहार ने नीतीश का दर्द समझा है कि अगर कोई मेहनत से काम करता है तो उसे मजदूरी दिल खोल कर दी जानी चाहिए। ऐसे में कारोबारियों को भी एक सीख मिली है कि अगर कोई मेहनत से काम करता है तो उसका हक जरूर मिलना चाहिए। देश के हर औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों में असंतोष है। नोएडा और गाजियाबाद में प्रबंधन से जुड़े लोगों की हत्या इसका उदाहरण है। तो ऐसी स्थिति में बिहार का मतदाता क्या संकेत दे रहा है.... क्या हर तिकड़म लगाकर, टैक्स की चोरी कर, सरकार में अपने प्यादे रखवाकर, बैलेंस सीट में गड़बड़ियां कर, सरकार से मिली भगत कर देश की संपत्ति को निजी संपत्ति बनाने में जुटे कारोबारी- एक तिमाही में तीन हजार करोड़ रुपये मुनाफा कमाने वाले कारोबारी जनता के इस संदेश को समझ पाएंगे? क्या वे बिहार के मजदूरी मॉडल को स्वीकार कर पाएंगे?

बहरहाल... बहुत दिन बाद राजनीति पर लिखने को मन में आया है। उम्मीद है कि अभी और कुछ भी जारी रहेगा...

साभार- जि‍दगी के रंग